https://www.facebook.com/sanjay.sharma.tahrir/posts/1550930711790081
#तहरीर #tahrir मीडिया रिलीज़ ( 08-11-14 ) – यूपी देता रहा दुहाई,
महिलाओं की इज्जत न बच पाई ; सीएम रहीं चाहे 'लालची' बहन मायावती, या
'लुपलुप' अखिलेश भाई l
महज ' अपराध मशीन' बनकर रह गयी है यूपी की सरकारी मशीनरी l l साल 2010 से
2013 तक यूपी में लगातार बढ़ते रहे महिलाओं के विरुद्ध अपराध l साल 2010
के मुकाबले 2011 में 12.25%,2012 में 16.86% और 2013 में 61.37% बढ़ीं हैं
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाएं l साल 2013 में साल 2010 के
मुकाबले रेप की 1487 अधिक (95.10%) घटनाएं , महिलाओं की शालीनता को भंग
करने की 4510 अधिक (161%) घटनाएं और दहेज़ निरोधक अधिनियम की 1162 अधिक
(1010%) घटनाएं हुईं l यूपी में महिलाओं के अपहरण की घटनाओं में साल 2010
से 2013 तक लगातार वृद्धि l साल 2013 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के
अपहरण की 78.07% घटनाएं अधिक l मायावती हों या अखिलेश यादव, दोनों सीएम
यूपी में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर लगाम लगाने में पूर्णतया विफल l
उत्तर प्रदेश में चाहें मायावती हों या अखिलेश यादव, ये दोनों ही सीएम के
रूप में महिलाओं की सुरक्षा के सम्बन्ध में दावे तो बड़े बड़े करते रहे पर
हक़ीक़त तो यह है कि ये दोनों ही सीएम यूपी में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
पर लगाम लगाने में पूर्णतः विफल रहे हैं l इस कड़वी सच्चाई का खुलासा
सामाजिक संस्था #तहरीर #tahrir के संस्थापक ई० संजय शर्मा की एक आरटीआई
पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के जन सूचना अधिकारी के० पी० उदय शंकर
द्वारा दिए गए एक जबाब से हुआ है l
#तहरीर #tahrir { Transparency, Accountability & Human Rights'
Initiative for Revolution – TAHRIR } लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन,
जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर
प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था है l
संजय को उपलब्ध कराई गयी सूचना के अनुसार उत्तर प्रदेश में साल 2010 में
20169,साल 2011 में 22639 ,साल 2012 में 23569 और साल 2013 में महिलाओं
के विरुद्ध अपराधों की 32546 घटनाएं सरकारी आंकड़ों में दर्ज हैं l गौरतलब
है कि वर्ष 2010 से मार्च 2012 तक सूबे की कमान मायावती के हाथ में थी और
मार्च 2012 से वर्ष 2013 तक की अवधि में अखिलेश यादव सूबे के मुखिया रहे
हैं lइन आकड़ों से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में साल 2011 में साल 2010
के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 2470 अधिक (12.25%) घटनाएं
हुईं l साल 2012 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की
3400 अधिक (16.86%) घटनाएं हुईं तो वही साल 2013 में साल 2010 के मुकाबले
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 12377 अधिक (61.37%) घटनाएं हुईं हैं l
संजय कहते हैं कि इन आकड़ों के साल-दर-साल विश्लेषण से भी यह स्पष्ट है कि
उत्तर प्रदेश में साल 2011 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध
अपराधों की 2470 अधिक घटनाएं ( 12.25%) हुईं l साल 2012 में साल 2011 के
मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 930 अधिक घटनाएं ( 4.10%) हुईं तो
वही साल 2013 में साल 2012 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की
8977 अधिक घटनाएं (38.09%) हुईं हैं जो यह सिद्ध कर रहा है कि साल 2010
से 2013 तक यूपी में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाओं में लगातार
वृद्धि ही हो रही है और फिर चाहें वह मायावती के नेतृत्व में बनी बहुजन
समाज पार्टी की सरकार हो या अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी समाजवादी
पार्टी की सरकार, सभी सरकारें महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाओं को
रोकने के मामले में महज कोरी वयानवाजी कर महिलाओं को गुमराह ही करती रही
हैं और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाओं को रोकने में पूर्णतया विफल
रही हैं l
संजय को उपलब्ध कराई गयी सूचना के अनुसार उत्तर प्रदेश में साल 2013 में
साल 2010 के मुकाबले रेप की 1487 घटनाएं अधिक (95.14%) घटनाएं हुईं,
महिलाओं की शालीनता को भंग करने की 4510 घटनाएं अधिक (161%) हुईं और दहेज़
निरोधक अधिनियम के अंतर्गत 1162 घटनाएं अधिक (1010%) दर्ज हुईं हैं l
यद्यपि महिलाओं के विरुद्ध सभी श्रेणियों के अपराधों में वृद्धि हुई है
किन्तु यूपी में महिलाओं के अपहरण की घटनाओं में साल 2010 से 2013 तक
लगातार वृद्धि ही हुई है l उत्तर प्रदेश में साल 2010 में 5468,साल 2011
में 7525 ,साल 2012 में 7910 और साल 2013 में महिलाओं के अपहरण की 9737
घटनाएं सरकारी आंकड़ों में दर्ज हैं l इस प्रकार उत्तर प्रदेश में साल
2013 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के अपहरण की 78.07% घटनाएं अधिक
हुईं l
सूबे में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाओं की संख्या में हो रही
बेतहाशा उत्तरोत्तर वृद्धि पर तंज कसते हुए संजय कहते है कि इतनी तेजी से
तो कारखानों की मशीनों की प्रोडक्टिविटी ( उत्पादकता ) भी नहीं बढ़ती है
और उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी को अपराध पैदा करने बाली ऐसी मशीन की
संज्ञा दी है जिसकी अपराध पैदा करने की प्रोडक्टिविटी ( उत्पादकता ) उच्च
दर पर बढ़ती ही जा रही है l
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को उत्तर प्रदेश के विकास के सभी मार्गों की
सबसे बड़ी वाधा बताते हुए संजय ने कहा कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के
परिपेक्ष्य में सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति, सरकार की दोषियों को बचाने या
बेकरूर को फसाने के दुरुद्देश्य से बेवजह दखल देने की प्रवृत्ति तथा
प्रशासनिक अमले और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट जबाबदेही के अभाव के
कारण ही सरकार, प्रशासनिक अमला और स्थानीय जनप्रतिनिधि महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों को रोकने के उपायों के क्रियान्वयन के प्रति गंभीर नहीं
हैं और सरकारें भी महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाएं हो जाने के बाद
महज सरकारी खानापूर्ति कर मामले की इतिश्री कर देती हैं पर वैज्ञानिक
सबूतों के आधार पर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाओं की त्वरित
विवेचना और न्यायालयों में इन मामलों का त्वरित निपटारा न होने के कारण
ही इन अपराधों की घटनाओं में लगातार वेतहाशा वृद्धि हो रही है l
संजय ने अब महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के परिपेक्ष्य में सरकार ,
प्रशासनिक अमले और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट जबाबदेही के
निर्धारण के लिए सामाजिक संस्था 'तहरीर' के माध्यम से एक व्यापक मुहिम
चलाने का ऐलान करते हुए इस सम्बन्ध में देश के प्रधानमंत्री , गृहमंत्री
और सूबे के राज्यपाल, मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर प्रशासनिक अमले और
स्थानीय जनप्रतिनिधियों को महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को रोकने के
उपायों के क्रियान्वयन के प्रति गंभीर बनाने हेतु उनकी स्पष्ट जबाबदेही
का निर्धारण करने हेतु नियम-कानून बनाने और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
की घटनाओं में वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
की घटनाओं की त्वरित और समयबद्ध विवेचना एवं न्यायालयों में इन मामलों का
त्वरित और समयबद्ध निपटारा किये जाने की मांग करने का भी ऐलान किया है l
संजय का कहना है कि वह यह जानना चाहते हैं कि यूपी में महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों में हो रही वृद्धि को यूपी की जनसँख्या वृद्धि-दर से
जोड़ने बाले सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव इन आंकड़ों पर क्या कहेंगे और इन
आंकड़ों पर क्या कहेंगे हालिया आगरा यात्रा के दौरान अन्य प्रदेशों के
अपराधियों द्वारा ही यूपी आकर अपराध करने का वक्तव्य देने बाले यूपी सीएम
अखिलेश यादव l
संजय जानना चाहते हैं कि क्या यूपी की जनसँख्या साल 2010 के मुकाबले 2011
में 12.25%,2012 में 16.86% और 2013 में 61.37% बढ़ी है ? संजय यह भी
जानना चाहते हैं कि क्या यूपी की पुलिस इतनी नपुंसक हो गयी है कि अन्य
प्रदेशों के अपराधी यूपी आकर अपराध करने लगे हैं ? संजय जानना चाहते हैं
कि यदि यूपी की पुलिस इतनी ही नपुंसक हो गयी है तो आखिर इन अपराधों पर
लगाम लगेगी कैसे ?
हालिया अखिलेश दास रिश्वत-प्रकरण से बेनकाब हुई मायावती एवं पिछले ढाई
साल से अपने चाचाओं और पिताजी के फरमानों के भंवर में फंसकर अपने बजूद तक
को खो रहे अखिलेश यादव के द्वारा महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम
के लिए किये गए प्रयासों की सफलता के परिपेक्ष्य में संजय ने कहा "यूपी
देता रहा दुहाई, महिलाओं की इज्जत न बचने पाई ; सीएम रहीं चाहे 'लालची'
बहन मायावती, या फिर हालिया 'लुपलुप' अखिलेश भाई l"
Sunday, 9 November 2014
Saturday, 8 November 2014
माया, अखिलेश दोनों के शासन में बढ़े महिलाओं के खिलाफ अपराध: तहरीर
माया, अखिलेश दोनों के शासन में बढ़े महिलाओं के खिलाफ अपराध: तहरीर
Written by Editor
Saturday, 08 November 2014 15:48
http://www.instantkhabar.com/lucknow/item/18172-lucknow.html
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में चाहें मायावती हों या अखिलेश यादव, ये दोनों ही
सीएम के रूप में महिलाओं की सुरक्षा के सम्बन्ध में दावे तो बड़े बड़े करते
रहे पर हक़ीक़त तो यह है कि ये दोनों ही सीएम यूपी में महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों पर लगाम लगाने में पूर्णतः विफल रहे हैं l इस कड़वी
सच्चाई का खुलासा सामाजिक संस्था 'तहरीर'* के संस्थापक ई० संजय शर्मा की
एक आरटीआई पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के जन सूचना अधिकारी के०
पी० उदय शंकर द्वारा दिए गए एक जवाब से हुआ है l
संजय को उपलब्ध कराई गयी सूचना के अनुसार उत्तर प्रदेश में साल 2010
में 20169,साल 2011 में 22639 ,साल 2012 में 23569 और साल 2013 में
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 32546 घटनाएं सरकारी आंकड़ों में दर्ज
हैंl गौरतलब है कि वर्ष 2010 से मार्च 2012 तक सूबे की कमान मायावती के
हाथ में थी और मार्च 2012 से वर्ष 2013 तक की अवधि में अखिलेश यादव सूबे
के मुखिया रहे हैं l इन आकड़ों से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में साल
2011 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 2470
अधिक (12.25%) घटनाएं हुईं l साल 2012 में साल 2010 के मुकाबले
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 3400 अधिक (16.86%) घटनाएं हुईं तो वही
साल 2013 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की
12377 अधिक (61.37%) घटनाएं हुईं हैं l
संजय कहते हैं कि इन आकड़ों के साल-दर-साल विश्लेषण से भी यह स्पष्ट है
कि उत्तर प्रदेश में साल 2011 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों की 2470 अधिक घटनाएं ( 12.25%) हुईं l साल 2012 में
साल 2011 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 930 अधिक घटनाएं
( 4.10%) हुईं तो वही साल 2013 में साल 2012 के मुकाबले महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों की 8977 अधिक घटनाएं (38.09%) हुईं हैं जो यह सिद्ध
कर रहा है कि साल 2010 से 2013 तक यूपी में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
की घटनाओं में लगातार वृद्धि ही हो रही है और फिर चाहें वह मायावती के
नेतृत्व में बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार हो या अखिलेश यादव के
नेतृत्व में बनी समाजवादी पार्टी की सरकार, सभी सरकारें महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों की घटनाओं को रोकने के मामले में महज कोरी वयानवाजी कर
महिलाओं को गुमराह ही करती रही हैं और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की
घटनाओं को रोकने में पूर्णतया विफल रही हैं l
संजय को उपलब्ध कराई गयी सूचना के अनुसार उत्तर प्रदेश में साल 2013
में साल 2010 के मुकाबले रेप की 1487 घटनाएं अधिक (95.14%) घटनाएं
हुईं, महिलाओं की शालीनता को भंग करने की 4510 घटनाएं अधिक (161%) हुईं
और दहेज़ निरोधक अधिनियम के अंतर्गत 1162 घटनाएं अधिक (1010%) दर्ज हुईं
हैं l
यद्यपि महिलाओं के विरुद्ध सभी श्रेणियों के अपराधों में वृद्धि हुई है
किन्तु यूपी में महिलाओं के अपहरण की घटनाओं में साल 2010 से 2013 तक
लगातार वृद्धि ही हुई है l उत्तर प्रदेश में साल 2010 में 5468,साल
2011 में 7525 ,साल 2012 में 7910 और साल 2013 में महिलाओं के अपहरण
की 9737 घटनाएं सरकारी आंकड़ों में दर्ज हैं l इस प्रकार उत्तर प्रदेश
में साल 2013 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के अपहरण की 78.07%
घटनाएं अधिक हुईं l
सूबे में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाओं की संख्या में हो रही
बेतहाशा उत्तरोत्तर वृद्धि पर तंज कसते हुए संजय कहते है कि इतनी तेजी से
तो कारखानों की मशीनों की प्रोडक्टिविटी ( उत्पादकता ) भी नहीं बढ़ती है
और उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी को अपराध पैदा करने बाली ऐसी मशीन की
संज्ञा दी है जिसकी अपराध पैदा करने की प्रोडक्टिविटी ( उत्पादकता )
उच्च दर पर बढ़ती ही जा रही है l
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को उत्तर प्रदेश के विकास के सभी मार्गों
की सबसे बड़ी वाधा बताते हुए संजय ने कहा कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
के परिपेक्ष्य में सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति, सरकार की दोषियों को
बचाने या बेकरूर को फसाने के दुरुद्देश्य से बेवजह दखल देने की
प्रवृत्ति तथा प्रशासनिक अमले और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट
जबाबदेही के अभाव के कारण ही सरकार, प्रशासनिक अमला और स्थानीय
जनप्रतिनिधि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को रोकने के उपायों के
क्रियान्वयन के प्रति गंभीर नहीं हैं और सरकारें भी महिलाओं के विरुद्ध
अपराधों की घटनाएं हो जाने के बाद महज सरकारी खानापूर्ति कर मामले की
इतिश्री कर देती हैं पर वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर महिलाओं के विरुद्ध
अपराधों की घटनाओं की त्वरित विवेचना और न्यायालयों में इन मामलों का
त्वरित निपटारा न होने के कारण ही इन अपराधों की घटनाओं में लगातार
बेतहाशा वृद्धि हो रही है l
संजय ने अब महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के परिपेक्ष्य में सरकार ,
प्रशासनिक अमले और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट जबाबदेही के
निर्धारण के लिए सामाजिक संस्था 'तहरीर' के माध्यम से एक व्यापक मुहिम
चलाने का ऐलान करते हुए इस सम्बन्ध में देश के प्रधानमंत्री , गृहमंत्री
और सूबे के राज्यपाल, मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर प्रशासनिक अमले और
स्थानीय जनप्रतिनिधियों को महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को रोकने के
उपायों के क्रियान्वयन के प्रति गंभीर बनाने हेतु उनकी स्पष्ट जबाबदेही
का निर्धारण करने हेतु नियम-कानून बनाने और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
की घटनाओं में वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
की घटनाओं की त्वरित और समयबद्ध विवेचना एवं न्यायालयों में इन मामलों
का त्वरित और समयबद्ध निपटारा किये जाने की मांग करने का भी ऐलान किया
है l
संजय का कहना है कि वह यह जानना चाहते हैं कि यूपी में महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों में हो रही वृद्धि को यूपी की जनसँख्या वृद्धि-दर से
जोड़ने बाले सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव इन आंकड़ों पर क्या कहेंगे और
इन आंकड़ों पर क्या कहेंगे हालिया आगरा यात्रा के दौरान अन्य प्रदेशों के
अपराधियों द्वारा ही यूपी आकर अपराध करने का वक्तव्य देने बाले यूपी
सीएम अखिलेश यादव l संजय जानना चाहते हैं कि क्या यूपी की जनसँख्या साल
2010 के मुकाबले 2011 में 12.25%,2012 में 16.86% और 2013 में 61.37% बढ़ी
है? संजय यह भी जानना चाहते हैं कि क्या यूपी की पुलिस इतनी नपुंसक हो
गयी है कि अन्य प्रदेशों के अपराधी यूपी आकर अपराध करने लगे हैं ? संजय
जानना चाहते हैं कि यदि यूपी की पुलिस इतनी ही नपुंसक हो गयी है तो आखिर
इन अपराधों पर लगाम लगेगी कैसे?
हालिया अखिलेश दास रिश्वत-प्रकरण से बेनकाब हुई मायावती एवं पिछले ढाई
साल से अपने चाचाओं और पिताजी के फरमानों के भंवर में फंसकर अपने बजूद
तक को खो रहे अखिलेश यादव के द्वारा महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की
रोकथाम के लिए किये गए प्रयासों की सफलता के परिपेक्ष्य में संजय ने
कहा "यूपी देता रहा दुहाई, महिलाओं की इज्जत न बचने पाई ; सीएम रहीं
चाहे 'लालची' बहन मायावती, या फिर हालिया 'लुपलुप' अखिलेश भाई l"
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
that i should delete your name from my mailing list.
Written by Editor
Saturday, 08 November 2014 15:48
http://www.instantkhabar.com/lucknow/item/18172-lucknow.html
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में चाहें मायावती हों या अखिलेश यादव, ये दोनों ही
सीएम के रूप में महिलाओं की सुरक्षा के सम्बन्ध में दावे तो बड़े बड़े करते
रहे पर हक़ीक़त तो यह है कि ये दोनों ही सीएम यूपी में महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों पर लगाम लगाने में पूर्णतः विफल रहे हैं l इस कड़वी
सच्चाई का खुलासा सामाजिक संस्था 'तहरीर'* के संस्थापक ई० संजय शर्मा की
एक आरटीआई पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के जन सूचना अधिकारी के०
पी० उदय शंकर द्वारा दिए गए एक जवाब से हुआ है l
संजय को उपलब्ध कराई गयी सूचना के अनुसार उत्तर प्रदेश में साल 2010
में 20169,साल 2011 में 22639 ,साल 2012 में 23569 और साल 2013 में
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 32546 घटनाएं सरकारी आंकड़ों में दर्ज
हैंl गौरतलब है कि वर्ष 2010 से मार्च 2012 तक सूबे की कमान मायावती के
हाथ में थी और मार्च 2012 से वर्ष 2013 तक की अवधि में अखिलेश यादव सूबे
के मुखिया रहे हैं l इन आकड़ों से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में साल
2011 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 2470
अधिक (12.25%) घटनाएं हुईं l साल 2012 में साल 2010 के मुकाबले
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 3400 अधिक (16.86%) घटनाएं हुईं तो वही
साल 2013 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की
12377 अधिक (61.37%) घटनाएं हुईं हैं l
संजय कहते हैं कि इन आकड़ों के साल-दर-साल विश्लेषण से भी यह स्पष्ट है
कि उत्तर प्रदेश में साल 2011 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों की 2470 अधिक घटनाएं ( 12.25%) हुईं l साल 2012 में
साल 2011 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की 930 अधिक घटनाएं
( 4.10%) हुईं तो वही साल 2013 में साल 2012 के मुकाबले महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों की 8977 अधिक घटनाएं (38.09%) हुईं हैं जो यह सिद्ध
कर रहा है कि साल 2010 से 2013 तक यूपी में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
की घटनाओं में लगातार वृद्धि ही हो रही है और फिर चाहें वह मायावती के
नेतृत्व में बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार हो या अखिलेश यादव के
नेतृत्व में बनी समाजवादी पार्टी की सरकार, सभी सरकारें महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों की घटनाओं को रोकने के मामले में महज कोरी वयानवाजी कर
महिलाओं को गुमराह ही करती रही हैं और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की
घटनाओं को रोकने में पूर्णतया विफल रही हैं l
संजय को उपलब्ध कराई गयी सूचना के अनुसार उत्तर प्रदेश में साल 2013
में साल 2010 के मुकाबले रेप की 1487 घटनाएं अधिक (95.14%) घटनाएं
हुईं, महिलाओं की शालीनता को भंग करने की 4510 घटनाएं अधिक (161%) हुईं
और दहेज़ निरोधक अधिनियम के अंतर्गत 1162 घटनाएं अधिक (1010%) दर्ज हुईं
हैं l
यद्यपि महिलाओं के विरुद्ध सभी श्रेणियों के अपराधों में वृद्धि हुई है
किन्तु यूपी में महिलाओं के अपहरण की घटनाओं में साल 2010 से 2013 तक
लगातार वृद्धि ही हुई है l उत्तर प्रदेश में साल 2010 में 5468,साल
2011 में 7525 ,साल 2012 में 7910 और साल 2013 में महिलाओं के अपहरण
की 9737 घटनाएं सरकारी आंकड़ों में दर्ज हैं l इस प्रकार उत्तर प्रदेश
में साल 2013 में साल 2010 के मुकाबले महिलाओं के अपहरण की 78.07%
घटनाएं अधिक हुईं l
सूबे में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की घटनाओं की संख्या में हो रही
बेतहाशा उत्तरोत्तर वृद्धि पर तंज कसते हुए संजय कहते है कि इतनी तेजी से
तो कारखानों की मशीनों की प्रोडक्टिविटी ( उत्पादकता ) भी नहीं बढ़ती है
और उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी को अपराध पैदा करने बाली ऐसी मशीन की
संज्ञा दी है जिसकी अपराध पैदा करने की प्रोडक्टिविटी ( उत्पादकता )
उच्च दर पर बढ़ती ही जा रही है l
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को उत्तर प्रदेश के विकास के सभी मार्गों
की सबसे बड़ी वाधा बताते हुए संजय ने कहा कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
के परिपेक्ष्य में सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति, सरकार की दोषियों को
बचाने या बेकरूर को फसाने के दुरुद्देश्य से बेवजह दखल देने की
प्रवृत्ति तथा प्रशासनिक अमले और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट
जबाबदेही के अभाव के कारण ही सरकार, प्रशासनिक अमला और स्थानीय
जनप्रतिनिधि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को रोकने के उपायों के
क्रियान्वयन के प्रति गंभीर नहीं हैं और सरकारें भी महिलाओं के विरुद्ध
अपराधों की घटनाएं हो जाने के बाद महज सरकारी खानापूर्ति कर मामले की
इतिश्री कर देती हैं पर वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर महिलाओं के विरुद्ध
अपराधों की घटनाओं की त्वरित विवेचना और न्यायालयों में इन मामलों का
त्वरित निपटारा न होने के कारण ही इन अपराधों की घटनाओं में लगातार
बेतहाशा वृद्धि हो रही है l
संजय ने अब महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के परिपेक्ष्य में सरकार ,
प्रशासनिक अमले और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट जबाबदेही के
निर्धारण के लिए सामाजिक संस्था 'तहरीर' के माध्यम से एक व्यापक मुहिम
चलाने का ऐलान करते हुए इस सम्बन्ध में देश के प्रधानमंत्री , गृहमंत्री
और सूबे के राज्यपाल, मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर प्रशासनिक अमले और
स्थानीय जनप्रतिनिधियों को महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को रोकने के
उपायों के क्रियान्वयन के प्रति गंभीर बनाने हेतु उनकी स्पष्ट जबाबदेही
का निर्धारण करने हेतु नियम-कानून बनाने और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
की घटनाओं में वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों
की घटनाओं की त्वरित और समयबद्ध विवेचना एवं न्यायालयों में इन मामलों
का त्वरित और समयबद्ध निपटारा किये जाने की मांग करने का भी ऐलान किया
है l
संजय का कहना है कि वह यह जानना चाहते हैं कि यूपी में महिलाओं के
विरुद्ध अपराधों में हो रही वृद्धि को यूपी की जनसँख्या वृद्धि-दर से
जोड़ने बाले सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव इन आंकड़ों पर क्या कहेंगे और
इन आंकड़ों पर क्या कहेंगे हालिया आगरा यात्रा के दौरान अन्य प्रदेशों के
अपराधियों द्वारा ही यूपी आकर अपराध करने का वक्तव्य देने बाले यूपी
सीएम अखिलेश यादव l संजय जानना चाहते हैं कि क्या यूपी की जनसँख्या साल
2010 के मुकाबले 2011 में 12.25%,2012 में 16.86% और 2013 में 61.37% बढ़ी
है? संजय यह भी जानना चाहते हैं कि क्या यूपी की पुलिस इतनी नपुंसक हो
गयी है कि अन्य प्रदेशों के अपराधी यूपी आकर अपराध करने लगे हैं ? संजय
जानना चाहते हैं कि यदि यूपी की पुलिस इतनी ही नपुंसक हो गयी है तो आखिर
इन अपराधों पर लगाम लगेगी कैसे?
हालिया अखिलेश दास रिश्वत-प्रकरण से बेनकाब हुई मायावती एवं पिछले ढाई
साल से अपने चाचाओं और पिताजी के फरमानों के भंवर में फंसकर अपने बजूद
तक को खो रहे अखिलेश यादव के द्वारा महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की
रोकथाम के लिए किये गए प्रयासों की सफलता के परिपेक्ष्य में संजय ने
कहा "यूपी देता रहा दुहाई, महिलाओं की इज्जत न बचने पाई ; सीएम रहीं
चाहे 'लालची' बहन मायावती, या फिर हालिया 'लुपलुप' अखिलेश भाई l"
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
that i should delete your name from my mailing list.
Sharp increase in crime against women in UP
http://timesofindia.indiatimes.com/City/Lucknow/Sharp-increase-in-crime-against-women-in-UP/articleshow/45081137.cms
Sharp increase in crime against women in UP
Neha Shukla,TNN | Nov 8, 2014, 06.55 PM IST
LUCKNOW: The biggest crime against women in UP is 'kidnapping and
abduction' and 'cruelty by husband or his relatives'. Incidents of
rape have seen a 95% rise in 2013 compared to 2010. Similarly,
incidents of kidnapping have seen at least 78% increase in 2013
compared to 2010.
Crime against women increased tremendously between 2010 and 2013 in
UP. Compared to 2010, there has been a sharp increase in incidents of
rape, molestation, dowry harassment and abduction and kidnapping of
women and girls in 2013.
In response to an RTI query by activist Sanjay Sharma, figures
provided by national crime record bureau (NCRB) show crime against
women increased by 12.25% in 2011, 16.8% in 2012 and 61.3% in 2013
compared to 2010.
In 2010, as many as 20,169 incidents of crime against women took place
in UP. In 2011, number of such incidents increased to 22,639 and in
2012, it increased further to 23,569. In 2013, there was a sharp
increase as 32,546 incidents of crime against women were recorded in
the state.
Compared to 2010, at least 1,487 more incidents of rape, 4,510 more
incidents of molestation and 1,162 more incidents of harassment for
dowry took place in 2013 in UP.
--
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Urvashi Sharma
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Sharp increase in crime against women in UP
Neha Shukla,TNN | Nov 8, 2014, 06.55 PM IST
LUCKNOW: The biggest crime against women in UP is 'kidnapping and
abduction' and 'cruelty by husband or his relatives'. Incidents of
rape have seen a 95% rise in 2013 compared to 2010. Similarly,
incidents of kidnapping have seen at least 78% increase in 2013
compared to 2010.
Crime against women increased tremendously between 2010 and 2013 in
UP. Compared to 2010, there has been a sharp increase in incidents of
rape, molestation, dowry harassment and abduction and kidnapping of
women and girls in 2013.
In response to an RTI query by activist Sanjay Sharma, figures
provided by national crime record bureau (NCRB) show crime against
women increased by 12.25% in 2011, 16.8% in 2012 and 61.3% in 2013
compared to 2010.
In 2010, as many as 20,169 incidents of crime against women took place
in UP. In 2011, number of such incidents increased to 22,639 and in
2012, it increased further to 23,569. In 2013, there was a sharp
increase as 32,546 incidents of crime against women were recorded in
the state.
Compared to 2010, at least 1,487 more incidents of rape, 4,510 more
incidents of molestation and 1,162 more incidents of harassment for
dowry took place in 2013 in UP.
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Thursday, 6 November 2014
Governor objects to govt’s recommendation to appoint Jawed Usmani as CIC
http://www.news18.com/news/uttar-pradesh/governor-objects-to-govts-recommendation-to-appoint-jawed-usmani-as-cic-634907.html
Politics
#Akhilesh Yadav #Jawed Usmani #Mulayam Singh Yadav
Governor objects to govt's recommendation to appoint Jawed Usmani as CIC
News18 | Gulam Jeelani | Thu Nov 06, 2014 | 12:05 IST
#Lucknow #Uttar Pradesh In a set back to Akhilesh Yadav-led
government, Uttar Pradesh governor Ram Naik has raised objections on
the former's proposal of appointing former chief secretary Jawed
Usmani as chief information commissioner (CIC) of the UP State
Information Commission.
Returning the proposal sent to him for final approval on Wednesday,
the governor also sought a vigilance report from the government on
Usmani.
The candidature of the 1978 IAS officer Usmani - currently posted as
Chairman of UP Board of Revenue - was approved by the selection
committee that met here under the chairmanship of chief minister
Akhilesh Yadav on Monday.
But the decision, sources said, has not gone down very well with the
governor who has to put the final stamp on the appointment. Usmani's
final appointment, according to sources, faced hurdles on account of
his past. Besides, the government had apparently sidelined a number of
eligible aspirants for the top job in UPSIC - the transparency
watchdog while forwarding Usmani's name. Also a non-profit
organization-Transparency, Accountability and Human Rights Initiative
for Revolution' (TAHRIR) had sent a memorandum to the governor warning
him against Usmani', who is due to retire in 2016.
Governor objects to govt
"Possible involvement of Jawed Usmani in Hindalco coal Scam case as
Central Bureau of Investigation had earlier decided to question Jawed
Usmani, the Chief Secretary of Uttar Pradesh and a former joint
secretary in the Prime Minister's Office, regarding the controversial
coal block allocation to Hindalco, though as a witness," the
memorandum said.
That Usmani is still a serving IAS officer and draws his salary from
the state exchequer, also seems to go against his appointment as CIC.
For the Right to Information Act clearly states that, since CIC is a
constitutional post, the incumbent should not be on the pay rolls of
any government.
Under these circumstances, the government is left with two
options-prepare a vigilance report and send it to the governor or
start a fresh selection of CIC. Noteworthy, the CIC post was vacated
after controversial ex-bureaucrat Ranjit Singh Pankaj's term was over
in July this year. Considered close to Samajwadi Party (SP) chief
Mulayam Singh Yadav, Usmani was appointed as chief secretary following
the party's landslide victory in 2012, becoming state's first Muslim
to occupy the top bureaucratic position. He was, however, shunted to
Board of Revenue soon after the SP's rout in Lok Sabha elections.
A CIC enjoys the status equivalent to that of a judge of the Supreme
Court and has a term of five years or till the completion of 65 years
age, whichever earlier. Not so long ago Usmani's name was doing the
rounds to take over as Secretary (Disinvestment) in Government of
India. Before that, he was expected to be appointed as secretary in
the Ministry of Environment and Forests, in Union government.
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
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Politics
#Akhilesh Yadav #Jawed Usmani #Mulayam Singh Yadav
Governor objects to govt's recommendation to appoint Jawed Usmani as CIC
News18 | Gulam Jeelani | Thu Nov 06, 2014 | 12:05 IST
#Lucknow #Uttar Pradesh In a set back to Akhilesh Yadav-led
government, Uttar Pradesh governor Ram Naik has raised objections on
the former's proposal of appointing former chief secretary Jawed
Usmani as chief information commissioner (CIC) of the UP State
Information Commission.
Returning the proposal sent to him for final approval on Wednesday,
the governor also sought a vigilance report from the government on
Usmani.
The candidature of the 1978 IAS officer Usmani - currently posted as
Chairman of UP Board of Revenue - was approved by the selection
committee that met here under the chairmanship of chief minister
Akhilesh Yadav on Monday.
But the decision, sources said, has not gone down very well with the
governor who has to put the final stamp on the appointment. Usmani's
final appointment, according to sources, faced hurdles on account of
his past. Besides, the government had apparently sidelined a number of
eligible aspirants for the top job in UPSIC - the transparency
watchdog while forwarding Usmani's name. Also a non-profit
organization-Transparency, Accountability and Human Rights Initiative
for Revolution' (TAHRIR) had sent a memorandum to the governor warning
him against Usmani', who is due to retire in 2016.
Governor objects to govt
"Possible involvement of Jawed Usmani in Hindalco coal Scam case as
Central Bureau of Investigation had earlier decided to question Jawed
Usmani, the Chief Secretary of Uttar Pradesh and a former joint
secretary in the Prime Minister's Office, regarding the controversial
coal block allocation to Hindalco, though as a witness," the
memorandum said.
That Usmani is still a serving IAS officer and draws his salary from
the state exchequer, also seems to go against his appointment as CIC.
For the Right to Information Act clearly states that, since CIC is a
constitutional post, the incumbent should not be on the pay rolls of
any government.
Under these circumstances, the government is left with two
options-prepare a vigilance report and send it to the governor or
start a fresh selection of CIC. Noteworthy, the CIC post was vacated
after controversial ex-bureaucrat Ranjit Singh Pankaj's term was over
in July this year. Considered close to Samajwadi Party (SP) chief
Mulayam Singh Yadav, Usmani was appointed as chief secretary following
the party's landslide victory in 2012, becoming state's first Muslim
to occupy the top bureaucratic position. He was, however, shunted to
Board of Revenue soon after the SP's rout in Lok Sabha elections.
A CIC enjoys the status equivalent to that of a judge of the Supreme
Court and has a term of five years or till the completion of 65 years
age, whichever earlier. Not so long ago Usmani's name was doing the
rounds to take over as Secretary (Disinvestment) in Government of
India. Before that, he was expected to be appointed as secretary in
the Ministry of Environment and Forests, in Union government.
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उत्तर प्रदेश : जावेद उस्मानी की तैनाती राजभवन और सरकार के टकराव का नया मुददा : सामाजिक संगठन 'तहरीर' ने भी राज्यपाल से इस मामले में तत्काल कोई निर्णय ना लेने की अपील की:
http://www.prabhatkhabar.com/news/up/uttar-pradesh-javed-usmani-royal-palace-government-percussion-new-an-issue-akhilesh-yadav/171325.html
state » up
उत्तर प्रदेश : जावेद उस्मानी की तैनाती राजभवन और सरकार के टकराव का नया मुददा
By News Desk | Publish Date: Nov 5 2014 4:03PM | Updated Date: Nov 5 2014 4:03PM
लखनऊ से राजेंद्र कुमार
यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर
जावेद उस्मानी की तैनाती करने का निर्णय विवादों के घेरे में आ गया है.
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने सोमवार को यूपी के मुख्य
सचिव रह चुके जावेद उस्मानी को मुख्य सूचना आयुक्त के पद तैनात करने का
निर्णय लिया था.
अखिलेश सरकार के इस फैसले को राज्यपाल राम नाईक को मंजूरी देनी है और
राज्यपाल इसके लिए तैयार नहीं हैं. राजभवन सूत्रों के अनुसार राज्यपाल इस
मामले में प्रदेश सरकार से कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण प्राप्त करने के बाद
ही अंतिम निर्णय लेंगे, क्योंकि कई संगठनों ने मुख्य सूचना आयुक्त के पद
पर जावेद उस्मानी की तैनाती पर सवाल खड़े किए हैं.
गौरतलब है कि चार माह पूर्व प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह
पंकज के रिटायर हुए थे. इस पद के लिए सरकार ने आवेदन मांगे. जिस पर
समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के समधी जो वर्तमान
में सूचना आयुक्त के पद पर तैनात हैं सहित 31 लोगों ने आवेदन किया.
इनमें जावेद उस्मानी भी शामिल हैं. यूपी के मुख्य सचिव रह चुके जावेद
उस्मानी 1978 बैच के आईएएस हैं और वर्तमान में वह राज्स्व परिषद में
चेयरमैन के पद पर तैनात हैं. जावेद उस्मानी को सपा प्रमुख मुलायम सिंह का
प्रिय अधिकारी माना जाता है, जिसके चलते ही यूपी में अखिलेश सरकार के
बनते ही मुलायम सिंह ने उन्हें केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति से बुलाकर
यूपी का मुख्य सचिव बनवा दिया था.
परंतु लोकसभा चुनावों में हुई करारी पराजय के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश
यादव ने उन्हें मुख्य सचिव के पद से हटाकर राजस्व परिषद के चेयरमैन पद पर
भेज दिया. बतौर आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी का कार्यकाल एक वर्ष से अधिक
का बाकी है. फिर भी उन्होंने यूपी के मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनाती
के लिए आवेदन कर दिया.
गत सोमवार को मुख्य सूचना आयुक्त के चयन को लेकर मुख्यमंत्री के आवास पर
चयन समिति की बैठक हुई. इससे पहले यह बैठक दो बार टल चुकी थी. इस समिति
में मुख्यमंत्री के अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद
मौर्य व स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन शामिल हुए. सूत्रों ने बताया कि बैठक
में सिर्फ मुख्य सूचना आयुक्त के नाम पर विचार हुआ और चयन समिति ने जावेद
उस्मानी के नाम पर अंतिम मुहर लगा दी. चयन समिति के इस निर्णय पर अब
राज्यपाल राम नाईक की मुहर लगेगी तभी जावेद उस्मानी को पद भार ग्रहण
कराया जाएगा, पर यह आसान नहीं है.
इसकी वजह जावेद उस्मानी से सीबीआई द्वारा कोल स्कैम को लेकर की गई पूछताछ
और जावेद उस्मानी का वीआरएस ना लेना बताया जा रहा है. जावेद उस्मानी अभी
रिटायर नहीं हुए हैं. उनका एक साल से अधिक का कार्यकाल बाकी है. ऐसे में
उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त का पद भार ग्रहण करने से लिए आईएएस सेवा
छोड़नी होगी.
इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति उन्हें लेनी पड़ेगी. इसमें समय भी लग
सकता है क्योंकि केंद्र सरकार कोल स्कैम में सीबीआई द्वारा की गई पूछताछ
की जानकारी प्राप्त करने के बाद ही निर्णय लेगी. ऐसी स्थिति में सूबे के
राज्यपाल इस मामले में प्रदेश सरकार से कुछ मुददो पर स्पष्टीकरण प्राप्त
करने के बाद ही कोई निर्णय लेंगे. राज्यभवन के सूत्रों का यह कहना है.
सामाजिक संगठन 'तहरीर' ने भी राज्यपाल से इस मामले में तत्काल कोई निर्णय
ना लेने की अपील की है तो कुछ संगठनों ने अखिलेश सरकार के इस फैसले पर
रोक लगाने के लिए न्यायालय जाने की बात कहीं है. इन संगठनों का कहना है
कि जावेद उस्मानी की मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनाती करने का निर्णय
सही नहीं है.
ऐसे में अब जावेद उस्मानी को मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनात करने का
यह प्रकरण तूल पकड़ेगा, यह स्पष्ट हो गया है और देखना यह होगा कि मामले
का गरमाने पर अखिलेश सरकार इस मामले में क्या निर्णय लेगी.
#उत्तर प्रदेश | #जावेद उस्मानी | #राजभवन | #सरकार | #टकराव | #नया
मुददा | #अखिलेश यादव | #Uttar Pradesh | #Javed Usmani | #the royal
palace | #government | #percussion | #new an issue | #Akhilesh Yadav
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उत्तर प्रदेश : जावेद उस्मानी की तैनाती राजभवन और सरकार के टकराव का नया मुददा
By News Desk | Publish Date: Nov 5 2014 4:03PM | Updated Date: Nov 5 2014 4:03PM
लखनऊ से राजेंद्र कुमार
यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर
जावेद उस्मानी की तैनाती करने का निर्णय विवादों के घेरे में आ गया है.
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने सोमवार को यूपी के मुख्य
सचिव रह चुके जावेद उस्मानी को मुख्य सूचना आयुक्त के पद तैनात करने का
निर्णय लिया था.
अखिलेश सरकार के इस फैसले को राज्यपाल राम नाईक को मंजूरी देनी है और
राज्यपाल इसके लिए तैयार नहीं हैं. राजभवन सूत्रों के अनुसार राज्यपाल इस
मामले में प्रदेश सरकार से कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण प्राप्त करने के बाद
ही अंतिम निर्णय लेंगे, क्योंकि कई संगठनों ने मुख्य सूचना आयुक्त के पद
पर जावेद उस्मानी की तैनाती पर सवाल खड़े किए हैं.
गौरतलब है कि चार माह पूर्व प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह
पंकज के रिटायर हुए थे. इस पद के लिए सरकार ने आवेदन मांगे. जिस पर
समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के समधी जो वर्तमान
में सूचना आयुक्त के पद पर तैनात हैं सहित 31 लोगों ने आवेदन किया.
इनमें जावेद उस्मानी भी शामिल हैं. यूपी के मुख्य सचिव रह चुके जावेद
उस्मानी 1978 बैच के आईएएस हैं और वर्तमान में वह राज्स्व परिषद में
चेयरमैन के पद पर तैनात हैं. जावेद उस्मानी को सपा प्रमुख मुलायम सिंह का
प्रिय अधिकारी माना जाता है, जिसके चलते ही यूपी में अखिलेश सरकार के
बनते ही मुलायम सिंह ने उन्हें केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति से बुलाकर
यूपी का मुख्य सचिव बनवा दिया था.
परंतु लोकसभा चुनावों में हुई करारी पराजय के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश
यादव ने उन्हें मुख्य सचिव के पद से हटाकर राजस्व परिषद के चेयरमैन पद पर
भेज दिया. बतौर आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी का कार्यकाल एक वर्ष से अधिक
का बाकी है. फिर भी उन्होंने यूपी के मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनाती
के लिए आवेदन कर दिया.
गत सोमवार को मुख्य सूचना आयुक्त के चयन को लेकर मुख्यमंत्री के आवास पर
चयन समिति की बैठक हुई. इससे पहले यह बैठक दो बार टल चुकी थी. इस समिति
में मुख्यमंत्री के अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद
मौर्य व स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन शामिल हुए. सूत्रों ने बताया कि बैठक
में सिर्फ मुख्य सूचना आयुक्त के नाम पर विचार हुआ और चयन समिति ने जावेद
उस्मानी के नाम पर अंतिम मुहर लगा दी. चयन समिति के इस निर्णय पर अब
राज्यपाल राम नाईक की मुहर लगेगी तभी जावेद उस्मानी को पद भार ग्रहण
कराया जाएगा, पर यह आसान नहीं है.
इसकी वजह जावेद उस्मानी से सीबीआई द्वारा कोल स्कैम को लेकर की गई पूछताछ
और जावेद उस्मानी का वीआरएस ना लेना बताया जा रहा है. जावेद उस्मानी अभी
रिटायर नहीं हुए हैं. उनका एक साल से अधिक का कार्यकाल बाकी है. ऐसे में
उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त का पद भार ग्रहण करने से लिए आईएएस सेवा
छोड़नी होगी.
इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति उन्हें लेनी पड़ेगी. इसमें समय भी लग
सकता है क्योंकि केंद्र सरकार कोल स्कैम में सीबीआई द्वारा की गई पूछताछ
की जानकारी प्राप्त करने के बाद ही निर्णय लेगी. ऐसी स्थिति में सूबे के
राज्यपाल इस मामले में प्रदेश सरकार से कुछ मुददो पर स्पष्टीकरण प्राप्त
करने के बाद ही कोई निर्णय लेंगे. राज्यभवन के सूत्रों का यह कहना है.
सामाजिक संगठन 'तहरीर' ने भी राज्यपाल से इस मामले में तत्काल कोई निर्णय
ना लेने की अपील की है तो कुछ संगठनों ने अखिलेश सरकार के इस फैसले पर
रोक लगाने के लिए न्यायालय जाने की बात कहीं है. इन संगठनों का कहना है
कि जावेद उस्मानी की मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनाती करने का निर्णय
सही नहीं है.
ऐसे में अब जावेद उस्मानी को मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनात करने का
यह प्रकरण तूल पकड़ेगा, यह स्पष्ट हो गया है और देखना यह होगा कि मामले
का गरमाने पर अखिलेश सरकार इस मामले में क्या निर्णय लेगी.
#उत्तर प्रदेश | #जावेद उस्मानी | #राजभवन | #सरकार | #टकराव | #नया
मुददा | #अखिलेश यादव | #Uttar Pradesh | #Javed Usmani | #the royal
palace | #government | #percussion | #new an issue | #Akhilesh Yadav
--
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Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
that i should delete your name from my mailing list.
राज्यभवन के सूत्रों का यह कहना है.सामाजिक संगठन 'तहरीर' ने भी राज्यपाल से इस मामले में तत्काल कोई निर्णय ना लेने की अपील की
http://www.prabhatkhabar.com/news/up/chief-information-commissioner-uttar-pradesh-akhilesh-yadav-governor/170731.html
मुख्य सूचना आयुक्त की तैनाती पर तनातनी
By Prabhat Khabar | Publish Date: Nov 4 2014 8:25PM | Updated Date:
Nov 4 2014 8:25PM
।।लखनऊ से राजेन्द्र कुमार।।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त के
पद पर जावेद उस्मानी की तैनाती करने का लिया गया निर्णय विवादों के घेरे
में आ गया है. मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने सोमवार को
यूपी के मुख्य सचिव रह चुके जावेद उस्मानी को मुख्य सूचना आयुक्त के पद
तैनात करने का निर्णय लिया था.
अखिलेश सरकार के इस फैसले को राज्यपाल राम नाईक को मंजूरी देनी है और
राज्यपाल इसके लिए तैयार नहीं हैं. राजभवन सूत्रों के अनुसार राज्यपाल इस
मामले में प्रदेश सरकार से कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण प्राप्त करने के बाद
ही अन्तिम निर्णय लेंगे, क्योंकि कई संगठनों ने मुख्य सूचना आयुक्त के पद
पर जावेद उस्मानी की तैनाती पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
गौरतलब है कि चार माह पूर्व प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह
पंकज के रिटायर हुए.इस पद के लिए सरकार ने आवेदन मांगे.जिस पर समाजवादी
पार्टी (सपा) के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के समधी जो वर्तमान में सूचना
आयुक्त के पद पर तैनात हैं सहित 31 लोगों ने आवेदन किया. इनमें जावेद
उस्मानी भी शामिल हैं. यूपी के मुख्य सचिव रह चुके जावेद उस्मानी 1978
बैच के आईएएस हैं और वर्तमान में वह राज्स्व परिषद में चेयरमैन के पद पर
तैनात हैं. जावेद उस्मानी को सपा प्रमुख मुलायम सिंह का प्रिय अधिकारी
माना जाता है, जिसके चलते ही यूपी में अखिलेश सरकार के बनते ही मुलायम
सिंह ने उन्हें केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति से बुलाकर यूपी का मुख्य
सचिव बनवा दिया था.
परन्तु लोकसभा चुनावों में हुई करारी पराजय के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश
यादव ने उन्हें मुख्य सचिव के पद से हटाकर राजस्व परिषद के चेयरमैन पद पर
भेज दिया. बतौर आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी का कार्यकाल एक वर्ष से अधिक
का बाकी है.फिर भी उन्होंने यूपी के मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनाती
के लिए आवेदन कर दिया.
गत सोमवार को मुख्य सूचना आयुक्त के चयन को लेकर मुख्यमंत्री के आवास पर
चयन समिति की बैठक हुई.इससे पहले यह बैठक दो बार टल चुकी थी.इस समिति में
मुख्यमंत्री के अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य व
स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन शामिल हुए.सूत्रों ने बताया कि बैठक में सिर्फ
मुख्य सूचना आयुक्त के नाम पर विचार हुआ और चयन समिति ने जावेद उस्मानी
के नाम पर अंतिम मुहर लगा दी गयी.चयन समिति के इस निर्णय पर अब राज्यपाल
राम नाईक की मुहर लगेगी तभी जावेद उस्मानी को पद भार ग्रहण कराया जाएगा,
पर यह इतना आसान नजर नहीं आता.
इसकी वजह जावेद उस्मानी से सीबीआई द्वारा कोल स्कैम को लेकर की गई पूछताछ
और जावेद उस्मानी का वीआरएस ना लेना बताया जा रहा है.जावेद उस्मानी अभी
रिटायर नहीं हुए हैं.उनका एक साल से अधिक का कार्यकाल बाकी है.ऐसे में
उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त का पद भार ग्रहण करने से लिए आईएएस सेवा
छोड़नी होगी.इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति उन्हें लेनी पड़ेगी.इसमें
समय भी लग सकता है क्योंकि केंद्र सरकार कोल स्कैम में सीबीआई द्वारा की
गई पूछताछ की जानकारी प्राप्त करने के बाद ही निर्णय लेगी.ऐसी स्थिति में
सूबे के राज्यपाल इस मामले में प्रदेश सरकार से कुछ मुददो पर स्पष्टीकरण
प्राप्त करने के बाद ही कोई निर्णय लेंगे.
राज्यभवन के सूत्रों का यह कहना है.सामाजिक संगठन 'तहरीर' ने भी राज्यपाल
से इस मामले में तत्काल कोई निर्णय ना लेने की अपील की है तो कुछ संगठनों
ने अखिलेश सरकार के इस फैसले पर रोक लगाने के लिए न्यायालय जाने की बात
कहीं है.इन संगठनों का कहना है कि जावेद उस्मानी की मुख्य सूचना आयुक्त
के पद पर तैनाती करने का निर्णय सही नहीं है.ऐसे में अब जावेद उस्मानी को
मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनात करने का यह प्रकरण तूल पकड़ेगा, यह
स्पष्ट हो गया है और देखना यह होगा कि मामले का गरमाने पर अखिलेश सरकार
इस मामले में क्या निर्णय लेगी.
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
that i should delete your name from my mailing list.
मुख्य सूचना आयुक्त की तैनाती पर तनातनी
By Prabhat Khabar | Publish Date: Nov 4 2014 8:25PM | Updated Date:
Nov 4 2014 8:25PM
।।लखनऊ से राजेन्द्र कुमार।।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त के
पद पर जावेद उस्मानी की तैनाती करने का लिया गया निर्णय विवादों के घेरे
में आ गया है. मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने सोमवार को
यूपी के मुख्य सचिव रह चुके जावेद उस्मानी को मुख्य सूचना आयुक्त के पद
तैनात करने का निर्णय लिया था.
अखिलेश सरकार के इस फैसले को राज्यपाल राम नाईक को मंजूरी देनी है और
राज्यपाल इसके लिए तैयार नहीं हैं. राजभवन सूत्रों के अनुसार राज्यपाल इस
मामले में प्रदेश सरकार से कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण प्राप्त करने के बाद
ही अन्तिम निर्णय लेंगे, क्योंकि कई संगठनों ने मुख्य सूचना आयुक्त के पद
पर जावेद उस्मानी की तैनाती पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
गौरतलब है कि चार माह पूर्व प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह
पंकज के रिटायर हुए.इस पद के लिए सरकार ने आवेदन मांगे.जिस पर समाजवादी
पार्टी (सपा) के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के समधी जो वर्तमान में सूचना
आयुक्त के पद पर तैनात हैं सहित 31 लोगों ने आवेदन किया. इनमें जावेद
उस्मानी भी शामिल हैं. यूपी के मुख्य सचिव रह चुके जावेद उस्मानी 1978
बैच के आईएएस हैं और वर्तमान में वह राज्स्व परिषद में चेयरमैन के पद पर
तैनात हैं. जावेद उस्मानी को सपा प्रमुख मुलायम सिंह का प्रिय अधिकारी
माना जाता है, जिसके चलते ही यूपी में अखिलेश सरकार के बनते ही मुलायम
सिंह ने उन्हें केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति से बुलाकर यूपी का मुख्य
सचिव बनवा दिया था.
परन्तु लोकसभा चुनावों में हुई करारी पराजय के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश
यादव ने उन्हें मुख्य सचिव के पद से हटाकर राजस्व परिषद के चेयरमैन पद पर
भेज दिया. बतौर आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी का कार्यकाल एक वर्ष से अधिक
का बाकी है.फिर भी उन्होंने यूपी के मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनाती
के लिए आवेदन कर दिया.
गत सोमवार को मुख्य सूचना आयुक्त के चयन को लेकर मुख्यमंत्री के आवास पर
चयन समिति की बैठक हुई.इससे पहले यह बैठक दो बार टल चुकी थी.इस समिति में
मुख्यमंत्री के अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य व
स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन शामिल हुए.सूत्रों ने बताया कि बैठक में सिर्फ
मुख्य सूचना आयुक्त के नाम पर विचार हुआ और चयन समिति ने जावेद उस्मानी
के नाम पर अंतिम मुहर लगा दी गयी.चयन समिति के इस निर्णय पर अब राज्यपाल
राम नाईक की मुहर लगेगी तभी जावेद उस्मानी को पद भार ग्रहण कराया जाएगा,
पर यह इतना आसान नजर नहीं आता.
इसकी वजह जावेद उस्मानी से सीबीआई द्वारा कोल स्कैम को लेकर की गई पूछताछ
और जावेद उस्मानी का वीआरएस ना लेना बताया जा रहा है.जावेद उस्मानी अभी
रिटायर नहीं हुए हैं.उनका एक साल से अधिक का कार्यकाल बाकी है.ऐसे में
उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त का पद भार ग्रहण करने से लिए आईएएस सेवा
छोड़नी होगी.इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति उन्हें लेनी पड़ेगी.इसमें
समय भी लग सकता है क्योंकि केंद्र सरकार कोल स्कैम में सीबीआई द्वारा की
गई पूछताछ की जानकारी प्राप्त करने के बाद ही निर्णय लेगी.ऐसी स्थिति में
सूबे के राज्यपाल इस मामले में प्रदेश सरकार से कुछ मुददो पर स्पष्टीकरण
प्राप्त करने के बाद ही कोई निर्णय लेंगे.
राज्यभवन के सूत्रों का यह कहना है.सामाजिक संगठन 'तहरीर' ने भी राज्यपाल
से इस मामले में तत्काल कोई निर्णय ना लेने की अपील की है तो कुछ संगठनों
ने अखिलेश सरकार के इस फैसले पर रोक लगाने के लिए न्यायालय जाने की बात
कहीं है.इन संगठनों का कहना है कि जावेद उस्मानी की मुख्य सूचना आयुक्त
के पद पर तैनाती करने का निर्णय सही नहीं है.ऐसे में अब जावेद उस्मानी को
मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर तैनात करने का यह प्रकरण तूल पकड़ेगा, यह
स्पष्ट हो गया है और देखना यह होगा कि मामले का गरमाने पर अखिलेश सरकार
इस मामले में क्या निर्णय लेगी.
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
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राजभवन ने लौटाई जावेद उस्मानी की तैनाती की फाइल
http://hindi.news18.com/news/uttar-pradesh/raj-bhawan-returns-jawed-usmanis-cic-proposal-file-390846.html
न्यूज
#अखिलेश यादव #जावेद उस्मानी #राम नाइक
राजभवन ने लौटाई जावेद उस्मानी की तैनाती की फाइल
News18 | Gulam Jeelani | Thu Nov 06, 2014 | 12:51 IST
#लखनऊ #उत्तर प्रदेश पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी को नए मुख्य
सूचना आयुक्त के अखिलेश सरकार के फैसले को राजभवन से मंजूरी नहीं मिल
पाई है। राज्यपाल राम नाइक ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए अपनी
मंजूरी नहीं दी और संबंधित फाइल लौटा दी।
1978 बैच के आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी फिलहाल यूपी बोर्ड ऑफ
रेवेन्यू के अध्यक्ष हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने
उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया था।
सूत्रों का कहना है कि जावेद उस्मानी का पिछला कार्यकाल काफी विवादित
रहा है। उनके खिलाफ कई आरोप लगाए गए थे। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने
सारे आरोपों को दरकिनार कर उन्हें राजस्व परिषद में उन्हें चेयरमैन
बनाया गया।
इधर, ट्रांसप्रेंसी अकाउंटबिलिटी एंड ह्यूमेन राइट्स इनिशिएटिव फॉर
रिवोल्यूशन (टीएएचआरआईआर) ने उस्मानी को लेकर राजभवन को सावधान करते
हुए ज्ञापन दिया था। इसमें कहा गया कि हिंडाल्को कोयला घोटाला में
सीबीआई को जावेद उस्मानी की भूमिका संदिग्ध रही है। जांच एजेंसी ने
उस्मानी से इस संबंध में उनसे पूछताछ भी की थी।
राजभवन ने लौटाई जावेद उस्मानी की तैनाती की फाइल
विश्लेषकों का कहना है कि सूचना आयुक्त के प्रमुख का पद संवैधानिक है।
ऐसे में किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि या विवादासस्पद शख्स की इस पद पर
नियुक्ति नहीं की जाती है।
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
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101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
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न्यूज
#अखिलेश यादव #जावेद उस्मानी #राम नाइक
राजभवन ने लौटाई जावेद उस्मानी की तैनाती की फाइल
News18 | Gulam Jeelani | Thu Nov 06, 2014 | 12:51 IST
#लखनऊ #उत्तर प्रदेश पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी को नए मुख्य
सूचना आयुक्त के अखिलेश सरकार के फैसले को राजभवन से मंजूरी नहीं मिल
पाई है। राज्यपाल राम नाइक ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए अपनी
मंजूरी नहीं दी और संबंधित फाइल लौटा दी।
1978 बैच के आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी फिलहाल यूपी बोर्ड ऑफ
रेवेन्यू के अध्यक्ष हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने
उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया था।
सूत्रों का कहना है कि जावेद उस्मानी का पिछला कार्यकाल काफी विवादित
रहा है। उनके खिलाफ कई आरोप लगाए गए थे। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने
सारे आरोपों को दरकिनार कर उन्हें राजस्व परिषद में उन्हें चेयरमैन
बनाया गया।
इधर, ट्रांसप्रेंसी अकाउंटबिलिटी एंड ह्यूमेन राइट्स इनिशिएटिव फॉर
रिवोल्यूशन (टीएएचआरआईआर) ने उस्मानी को लेकर राजभवन को सावधान करते
हुए ज्ञापन दिया था। इसमें कहा गया कि हिंडाल्को कोयला घोटाला में
सीबीआई को जावेद उस्मानी की भूमिका संदिग्ध रही है। जांच एजेंसी ने
उस्मानी से इस संबंध में उनसे पूछताछ भी की थी।
राजभवन ने लौटाई जावेद उस्मानी की तैनाती की फाइल
विश्लेषकों का कहना है कि सूचना आयुक्त के प्रमुख का पद संवैधानिक है।
ऐसे में किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि या विवादासस्पद शख्स की इस पद पर
नियुक्ति नहीं की जाती है।
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
that i should delete your name from my mailing list.
Tuesday, 4 November 2014
जावेद उस्मानी की उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त पद पर नियुक्ति का विरोध : उस्मानी के दागदार अतीत, लम्बी छुट्टियों पर जाने की आदत और प्रदेश के मुख्य सचिव के तौर पर असफलताओं का हवाला देते हुए सामाजिक संगठन 'तहरीर' ने राज्यपाल राम नाइक को भेजी है विरोध याचिका : 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला और हिण्डालको कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले का भी जिक्र है हमारी विरोध याचिका में l
जावेद उस्मानी की उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त पद पर नियुक्ति का
विरोध : उस्मानी के दागदार अतीत, लम्बी छुट्टियों पर जाने की आदत और
प्रदेश के मुख्य सचिव के तौर पर असफलताओं का हवाला देते हुए सामाजिक
संगठन 'तहरीर' ने राज्यपाल राम नाइक को भेजी है विरोध याचिका : 2 जी
स्पेक्ट्रम घोटाला और हिण्डालको कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले का भी जिक्र है
हमारी विरोध याचिका में l
राज्यपाल राम नाइक को आंग्ल भाषा में ई-मेल द्वारा प्रेषित की गयी विरोध
याचिका अग्रलिखित है l
To,
Sri Ram Naik
Hon'ble The Governor of Uttar Pradesh
Rajbhavan,Lucknow,Uttar Pardesh,India,Pin Code - 226001
Sub. : Petition against selection of Sri Jawed Usmani, An IAS officer
of the 1978 batch as Chief Information Commissioner of Uttar Pradesh
on grounds of Usmani's dubious past, long-leave taking habits and his
gross incapacity to deliver results to the state of U.P. while working
as Chief Secretary
Letter No. : TAHRIR/1/2014-15/141104 Date : 04-11-2014
Sir,
'Transparency, Accountability & Human Rights Initiative for
Revolution' (TAHRIR) is a Bareilly/Lucknow based NGO working in the
fields of Transparency & Accountability in Public Life and also for
protection of Human Rights in India.
Through this petition/memorandum, we are bringing forth following
self-explanatory facts exhibiting the great lacuna and deliberate
non-cognizance of given facts by the selection committee that made a
go through to the name of Sri Usmani for the post of Chief Information
Commissioner of Uttar Pradesh.
We are putting forth following facts before your goodself which are
related to his dubious past, his habit of being on long leaves and
also about his proved incapacity:
1- Possible involvement of Sri Jawed Usmani in 2G scam related case
because documents obtained under RTI by activist Sri Vivek Garg had
revealed that In a letter dated 10th January, 2006, Sri J.S. Sharma,
the then telecom secretary, wrote to Sri Jawed Usmani, the then joint
secretary to the prime minister, and sent a different Terms of
Refrences, which were approved by the telecom minister. There Terms of
Refrences were totally different from the original Terms of Refrences,
in which, the pricing of spectrum was not even mentioned. This was
said to be the root cause and beginning of spectrum scam.
2- Possible involvement of Sri Jawed Usmani in Hindalco coal Scam case
as Central Bureau of Investigation had earlier decided to question
Jawed Usmani, the Chief Secretary of Uttar Pradesh and a former joint
secretary in the Prime Minister's Office, regarding the controversial
coal block allocation to Hindalco, though "as a witness".
3- Sri Usmani has been a habitual long leave taker, a fact revealed by
a RTI plea filed by undersigned so we are sure he shall not be able to
do justice with the info-seekers.
4- Sri Usmani was recently removed from the post of Chief Secretary
just after Lok Sabha Elections of course because of his proved
incapacity to deliver results to the state as Chief Secretary so We
are sure that he shall not be able to do justice with even higher post
of Chief Information Commissioner of State which is equivalent to
Election Commissioner of India and deliver to the state on
transparency front.
So, in the larger interest of the society ,we are requesting you not
to give a final nod to the name of Sri Jawed Usmani as head of
transparency regime in Uttar Pradesh and remit the matter back to the
selection committee with the direction to select a person of clean &
clear past and a proved professionally successful track record on the
said post.
Humbly sent with lots of expectations,
Sincerely yours,
Er. Sanjay Sharma
Founder & President
Transparency, Accountability & Human Rights Initiative for Revolution
101,Narain Tower,F Block,Rajajipuram
Lucknow,Uttar Pradesh-226017
E-mail tahririndia@gmail.com
Mobile 936961353
Letter No. : TAHRIR/1/2014-15/141104 Date : 04-11-2014
( TAKEN FROM FACEBOOK WALL OF SANJAY SHARMA )
विरोध : उस्मानी के दागदार अतीत, लम्बी छुट्टियों पर जाने की आदत और
प्रदेश के मुख्य सचिव के तौर पर असफलताओं का हवाला देते हुए सामाजिक
संगठन 'तहरीर' ने राज्यपाल राम नाइक को भेजी है विरोध याचिका : 2 जी
स्पेक्ट्रम घोटाला और हिण्डालको कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले का भी जिक्र है
हमारी विरोध याचिका में l
राज्यपाल राम नाइक को आंग्ल भाषा में ई-मेल द्वारा प्रेषित की गयी विरोध
याचिका अग्रलिखित है l
To,
Sri Ram Naik
Hon'ble The Governor of Uttar Pradesh
Rajbhavan,Lucknow,Uttar Pardesh,India,Pin Code - 226001
Sub. : Petition against selection of Sri Jawed Usmani, An IAS officer
of the 1978 batch as Chief Information Commissioner of Uttar Pradesh
on grounds of Usmani's dubious past, long-leave taking habits and his
gross incapacity to deliver results to the state of U.P. while working
as Chief Secretary
Letter No. : TAHRIR/1/2014-15/141104 Date : 04-11-2014
Sir,
'Transparency, Accountability & Human Rights Initiative for
Revolution' (TAHRIR) is a Bareilly/Lucknow based NGO working in the
fields of Transparency & Accountability in Public Life and also for
protection of Human Rights in India.
Through this petition/memorandum, we are bringing forth following
self-explanatory facts exhibiting the great lacuna and deliberate
non-cognizance of given facts by the selection committee that made a
go through to the name of Sri Usmani for the post of Chief Information
Commissioner of Uttar Pradesh.
We are putting forth following facts before your goodself which are
related to his dubious past, his habit of being on long leaves and
also about his proved incapacity:
1- Possible involvement of Sri Jawed Usmani in 2G scam related case
because documents obtained under RTI by activist Sri Vivek Garg had
revealed that In a letter dated 10th January, 2006, Sri J.S. Sharma,
the then telecom secretary, wrote to Sri Jawed Usmani, the then joint
secretary to the prime minister, and sent a different Terms of
Refrences, which were approved by the telecom minister. There Terms of
Refrences were totally different from the original Terms of Refrences,
in which, the pricing of spectrum was not even mentioned. This was
said to be the root cause and beginning of spectrum scam.
2- Possible involvement of Sri Jawed Usmani in Hindalco coal Scam case
as Central Bureau of Investigation had earlier decided to question
Jawed Usmani, the Chief Secretary of Uttar Pradesh and a former joint
secretary in the Prime Minister's Office, regarding the controversial
coal block allocation to Hindalco, though "as a witness".
3- Sri Usmani has been a habitual long leave taker, a fact revealed by
a RTI plea filed by undersigned so we are sure he shall not be able to
do justice with the info-seekers.
4- Sri Usmani was recently removed from the post of Chief Secretary
just after Lok Sabha Elections of course because of his proved
incapacity to deliver results to the state as Chief Secretary so We
are sure that he shall not be able to do justice with even higher post
of Chief Information Commissioner of State which is equivalent to
Election Commissioner of India and deliver to the state on
transparency front.
So, in the larger interest of the society ,we are requesting you not
to give a final nod to the name of Sri Jawed Usmani as head of
transparency regime in Uttar Pradesh and remit the matter back to the
selection committee with the direction to select a person of clean &
clear past and a proved professionally successful track record on the
said post.
Humbly sent with lots of expectations,
Sincerely yours,
Er. Sanjay Sharma
Founder & President
Transparency, Accountability & Human Rights Initiative for Revolution
101,Narain Tower,F Block,Rajajipuram
Lucknow,Uttar Pradesh-226017
E-mail tahririndia@gmail.com
Mobile 936961353
Letter No. : TAHRIR/1/2014-15/141104 Date : 04-11-2014
( TAKEN FROM FACEBOOK WALL OF SANJAY SHARMA )
Saturday, 1 November 2014
वैद्युत ऊर्जा के प्रवंधन में माया के मुकाबले अखिलेश अक्षम Akhilesh inefficient to Mayawati in Energy Management: यूपी की विद्युत आवश्यकता का महज 19.65% उत्पादन निजी क्षेत्र द्वारा : ऊर्जा क्षेत्र में पूंजीनिवेश के सरकारी दावे खोखले : 14500 मेगावाट है यूपी की विद्युत आवश्यकता : केवल 2850 मेगावाट उत्पादन हेतु ही किया गया है निजी क्षेत्र द्वारा निवेश : लगभग 1400 मेगावाट वैद्युत ऊर्जा की कमी है यूपी में
लखनऊ l कहने को तो उत्तर प्रदेश भारत का सर्वाधिक आवादी वाला प्रदेश होने
के कारण औधोगिक घरानों , पूंजीपतियों और निवेशकों के लिए सर्वाधिक
संभावनाओं वाला प्रदेश होना चाहिए पर बदहाल कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार
को पोषित करने के निहितार्थ लागू छद्म प्रशासनिक लालफीताशाही और ऊर्जा
की कमी के चलते ही सूबे में औधोगिक क्षेत्रों में बड़े पूंजीनिवेश की दर
लगभग नगण्य है l यह इस प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि आजादी के 67 साल बाद
भी उत्तर प्रदेश पर पूंजीपतियों का विश्वास जम नहीं पाया है और आज यूपी
की विद्युत आवश्यकता का महज 19.65% उत्पादन ही निजी क्षेत्र द्वारा किया
जा रहा है l
कहने को तो सूबे की सभी सरकारें ऊर्जा क्षेत्र में पूंजीनिवेश के बड़े
बड़े सरकारी दावे करती रही है और प्रदेश को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर
बनाने की बात करती हैं पर सामाजिक संस्था 'तहरीर'* के संस्थापक ई० संजय
शर्मा की एक आरटीआई ने इन सरकारी दावों की पोल खोल दी है l
*'तहरीर' { Transparency, Accountability & Human Rights' Initiative
for Revolution – TAHRIR } लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही
निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश
में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था है l
उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन के ऊर्जा क्रय अनुबंध निदेशालय के जनसूचना
अधिकारी कल्लन प्रसाद द्वारा संजय को दिए गए जबाब के अनुसार यूपी में
निजी क्षेत्र में रोजा तापीय विधुत परियोजना में 1200 मेगावाट, लैंको
अनपरा तापीय परियोजना में 1200 मेगावाट और बजाज एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
द्वारा 5 परियोजनाओं में कुल 450 मेगावाट बिजली उत्पादन हेतु पूंजीनिवेश
किया गया है l संजय बताते हैं कि इस प्रकार सूबे में केवल 2850 मेगावाट
उत्पादन हेतु ही निजी क्षेत्र द्वारा निवेश किया गया है जबकि वर्ष
2014-15 क़े लिए यूपी की विद्युत आवश्यकता लगभग 14500 मेगावाट है और सूबे
में 1400 मेगावाट विद्युत ऊर्जा की कमी है l
संजय बताते हैं कि आरटीआई में दिए गए इस जबाब के अनुसार यूपी ने
पूर्ववर्ती सीएम मायावती के कार्यकाल में एनर्जी एक्सचेंज से वर्ष 2011
-12 में 34.3 मिलियन यूनिट बिजली खरीदी थी जो वर्तमान सीएम अखिलेश यादव
के सत्ता संभालने के बाद और वर्ष 2012 -13 में 45.5 मिलियन यूनिट था पर
वर्ष 2013 -14 में आश्चर्यजनक रूप से बढ़कर 1936.38 मिलियन यूनिट हो गया
जबकि आम जनता को विद्युत आपूर्ति के सन्दर्भ में कोई राहत नहीं मिली थी
l संजय बताते हैं कि वर्ष 2011-12 में मायावती के कार्यकाल में भी यूपी
की विद्युत आवश्यकता लगभग 13947 मेगावाट थी l
संजय का कहना है कि वर्ष 2014 -15 में भी मात्र 6 माह में सितम्बर
2014 तक यूपी ने एनर्जी एक्सचेंज से1518.23 मिलियन यूनिट बिजली खरीदी है
और 1251.14 मिलियन यूनिट बिजली बैंकिंग के जरिये क्रय की है जो पिछले
चार वर्षों में सर्वाधिक है पर इतने पर भी आम जनता का विद्युत आपूर्ति
के लिए त्राहि-त्राहि करना स्वतः सिद्ध करता है कि वैद्युत ऊर्जा के
प्रवंधन में अखिलेश यादव पूर्ववर्ती सीएम मायावती मुकाबले अक्षम रहे
हैं l
वर्ष 2016-17 में यूपी की विद्युत आवश्यकता बढ़कर लगभग 19622 मेगावाट हो
जाने के मद्देनज़र कुशल ऊर्जा प्रवंधन की आवश्यकता पर बल देते हुए संजय
ने 24 घंटे निर्वाध विधुत आपूर्ति पाने को आम नागरिक का मानवाधिकार बताते
हुए सरकार से अपनी जबाबदेही को सच्चे दिल से आत्मसात करते हुए
पारदर्शिता के साथ काम करके कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने और
भ्रष्टाचार को पोषित करने के निहितार्थ लागू छद्म प्रशासनिक लालफीताशाही
को समाप्त कर सूबे में विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में निजी क्षेत्र
द्वारा पूंजीनिवेश के अवसरों को अमली जामा पहनाकर प्रदेश को ऊर्जा
क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की अपील भी की है l
Scanned Copy of two pages of RTI reply is attached.
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
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that i should delete your name from my mailing list.
के कारण औधोगिक घरानों , पूंजीपतियों और निवेशकों के लिए सर्वाधिक
संभावनाओं वाला प्रदेश होना चाहिए पर बदहाल कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार
को पोषित करने के निहितार्थ लागू छद्म प्रशासनिक लालफीताशाही और ऊर्जा
की कमी के चलते ही सूबे में औधोगिक क्षेत्रों में बड़े पूंजीनिवेश की दर
लगभग नगण्य है l यह इस प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि आजादी के 67 साल बाद
भी उत्तर प्रदेश पर पूंजीपतियों का विश्वास जम नहीं पाया है और आज यूपी
की विद्युत आवश्यकता का महज 19.65% उत्पादन ही निजी क्षेत्र द्वारा किया
जा रहा है l
कहने को तो सूबे की सभी सरकारें ऊर्जा क्षेत्र में पूंजीनिवेश के बड़े
बड़े सरकारी दावे करती रही है और प्रदेश को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर
बनाने की बात करती हैं पर सामाजिक संस्था 'तहरीर'* के संस्थापक ई० संजय
शर्मा की एक आरटीआई ने इन सरकारी दावों की पोल खोल दी है l
*'तहरीर' { Transparency, Accountability & Human Rights' Initiative
for Revolution – TAHRIR } लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही
निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश
में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था है l
उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन के ऊर्जा क्रय अनुबंध निदेशालय के जनसूचना
अधिकारी कल्लन प्रसाद द्वारा संजय को दिए गए जबाब के अनुसार यूपी में
निजी क्षेत्र में रोजा तापीय विधुत परियोजना में 1200 मेगावाट, लैंको
अनपरा तापीय परियोजना में 1200 मेगावाट और बजाज एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
द्वारा 5 परियोजनाओं में कुल 450 मेगावाट बिजली उत्पादन हेतु पूंजीनिवेश
किया गया है l संजय बताते हैं कि इस प्रकार सूबे में केवल 2850 मेगावाट
उत्पादन हेतु ही निजी क्षेत्र द्वारा निवेश किया गया है जबकि वर्ष
2014-15 क़े लिए यूपी की विद्युत आवश्यकता लगभग 14500 मेगावाट है और सूबे
में 1400 मेगावाट विद्युत ऊर्जा की कमी है l
संजय बताते हैं कि आरटीआई में दिए गए इस जबाब के अनुसार यूपी ने
पूर्ववर्ती सीएम मायावती के कार्यकाल में एनर्जी एक्सचेंज से वर्ष 2011
-12 में 34.3 मिलियन यूनिट बिजली खरीदी थी जो वर्तमान सीएम अखिलेश यादव
के सत्ता संभालने के बाद और वर्ष 2012 -13 में 45.5 मिलियन यूनिट था पर
वर्ष 2013 -14 में आश्चर्यजनक रूप से बढ़कर 1936.38 मिलियन यूनिट हो गया
जबकि आम जनता को विद्युत आपूर्ति के सन्दर्भ में कोई राहत नहीं मिली थी
l संजय बताते हैं कि वर्ष 2011-12 में मायावती के कार्यकाल में भी यूपी
की विद्युत आवश्यकता लगभग 13947 मेगावाट थी l
संजय का कहना है कि वर्ष 2014 -15 में भी मात्र 6 माह में सितम्बर
2014 तक यूपी ने एनर्जी एक्सचेंज से1518.23 मिलियन यूनिट बिजली खरीदी है
और 1251.14 मिलियन यूनिट बिजली बैंकिंग के जरिये क्रय की है जो पिछले
चार वर्षों में सर्वाधिक है पर इतने पर भी आम जनता का विद्युत आपूर्ति
के लिए त्राहि-त्राहि करना स्वतः सिद्ध करता है कि वैद्युत ऊर्जा के
प्रवंधन में अखिलेश यादव पूर्ववर्ती सीएम मायावती मुकाबले अक्षम रहे
हैं l
वर्ष 2016-17 में यूपी की विद्युत आवश्यकता बढ़कर लगभग 19622 मेगावाट हो
जाने के मद्देनज़र कुशल ऊर्जा प्रवंधन की आवश्यकता पर बल देते हुए संजय
ने 24 घंटे निर्वाध विधुत आपूर्ति पाने को आम नागरिक का मानवाधिकार बताते
हुए सरकार से अपनी जबाबदेही को सच्चे दिल से आत्मसात करते हुए
पारदर्शिता के साथ काम करके कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने और
भ्रष्टाचार को पोषित करने के निहितार्थ लागू छद्म प्रशासनिक लालफीताशाही
को समाप्त कर सूबे में विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में निजी क्षेत्र
द्वारा पूंजीनिवेश के अवसरों को अमली जामा पहनाकर प्रदेश को ऊर्जा
क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की अपील भी की है l
Scanned Copy of two pages of RTI reply is attached.
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
that i should delete your name from my mailing list.
Thursday, 30 October 2014
अखिलेश सरकार ने पुनः टाला सूचना आयुक्तों की बैठक
http://www.jansattaexpress.net/print/8510.html
अखिलेश सरकार ने पुनः टाला सूचना आयुक्तों की बैठक
'तहरीर' के धरने और सूचना आयुक्तों को चुनौती देने से दबाब में आयी
सरकार ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना आयुक्त के चयन
के लिए बीते बृहस्पतिवार होने वाली बैठक स्थगित कर दी है। 'तहरीर' के
विरोध के चलते ही यह बैठक इसके पहले भी एक बार स्थगित हो चुकी है।
अखिलेश सरकार ने पुनः टाला सूचना आयुक्तों की बैठक 'तहरीर' के धरने और
सूचना आयुक्तों को चुनौती देने से दबाब में आयी सरकार ने उत्तर प्रदेश के
मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना आयुक्त के चयन के लिए बीते बृहस्पतिवार
होने वाली बैठक स्थगित कर दी है। 'तहरीर' के विरोध के चलते ही यह बैठक
इसके पहले भी एक बार स्थगित हो चुकी है।
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त
का पद 30 जून 2014 से खाली है। इससे पहले सरकार ने इन दोनों पदों पर चयन
के लिए पहले 28 जून 2014 को चयन समिति की बैठक बुलाई थी जिसमें बिना
आवेदन के सीधे चयन समिति द्वारा इन दोनों पदों पर चयन की तैयारी थी जिसका
कड़ा विरोध किया गया था और पूर्व की भांति आवेदन मंगाने की मांग की गयी
थी। हमारे दबाब में यह बैठक स्थगित कर दी गई थी और प्रशासनिक सुधार विभाग
द्वारा बीते अगस्त में इन दोनों पदों पर चयन के लिए आवेदन मांगे गए थे।
लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर दिनांक
12 अक्टूबर 2014 को राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान धरना स्थल पर
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना
और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते
हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती के कार्यक्रम का
आयोजन येश्वर्याज सेवा संस्थान, एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन ,
आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी , ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार
कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम, मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन
सूचना अधिकार जागरूकता मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी
मेमोरियल समाज सेवा संस्थान , आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड
ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही
भारत निर्माण मंच आदि संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया. कार्यक्रम
में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया लखनऊ चैप्टर, सोसाइटी फॉर फ़ास्ट
जस्टिस लखनऊ और उत्तर प्रदेश रोडवेज संविदा कर्मचारी संघ ने भी तहरीर को
समर्थन प्रदान करते हुए शिरकत की थी l 'तहरीर' इन सभी संगठनों को उनके
सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है l इस सम्बन्ध में ज्ञापन को जिला
प्रशासन के माध्यम से भेजने के साथ साथ हमारे द्वारा सीधे उत्तर प्रदेश
के राज्यपाल महोदय को तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी प्रेषित कर दिया
गया है जो इस स्टेटस के साथ अपलोड किया जा रहा है।
यदि आपके पास भी मीडिया जगत से संबंधित कोई समाचार या फिर आलेख हो तो
हमें jansattaexp@gmail.com पर य़ा फिर फोन नंबर 9650258033 पर बता सकते
हैं। हम आपकी पहचान हमेशा गुप्त रखेंगे। - संपादक
--
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अखिलेश सरकार ने पुनः टाला सूचना आयुक्तों की बैठक
'तहरीर' के धरने और सूचना आयुक्तों को चुनौती देने से दबाब में आयी
सरकार ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना आयुक्त के चयन
के लिए बीते बृहस्पतिवार होने वाली बैठक स्थगित कर दी है। 'तहरीर' के
विरोध के चलते ही यह बैठक इसके पहले भी एक बार स्थगित हो चुकी है।
अखिलेश सरकार ने पुनः टाला सूचना आयुक्तों की बैठक 'तहरीर' के धरने और
सूचना आयुक्तों को चुनौती देने से दबाब में आयी सरकार ने उत्तर प्रदेश के
मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना आयुक्त के चयन के लिए बीते बृहस्पतिवार
होने वाली बैठक स्थगित कर दी है। 'तहरीर' के विरोध के चलते ही यह बैठक
इसके पहले भी एक बार स्थगित हो चुकी है।
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त
का पद 30 जून 2014 से खाली है। इससे पहले सरकार ने इन दोनों पदों पर चयन
के लिए पहले 28 जून 2014 को चयन समिति की बैठक बुलाई थी जिसमें बिना
आवेदन के सीधे चयन समिति द्वारा इन दोनों पदों पर चयन की तैयारी थी जिसका
कड़ा विरोध किया गया था और पूर्व की भांति आवेदन मंगाने की मांग की गयी
थी। हमारे दबाब में यह बैठक स्थगित कर दी गई थी और प्रशासनिक सुधार विभाग
द्वारा बीते अगस्त में इन दोनों पदों पर चयन के लिए आवेदन मांगे गए थे।
लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर दिनांक
12 अक्टूबर 2014 को राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान धरना स्थल पर
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना
और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते
हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती के कार्यक्रम का
आयोजन येश्वर्याज सेवा संस्थान, एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन ,
आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी , ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार
कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम, मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन
सूचना अधिकार जागरूकता मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी
मेमोरियल समाज सेवा संस्थान , आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड
ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही
भारत निर्माण मंच आदि संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया. कार्यक्रम
में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया लखनऊ चैप्टर, सोसाइटी फॉर फ़ास्ट
जस्टिस लखनऊ और उत्तर प्रदेश रोडवेज संविदा कर्मचारी संघ ने भी तहरीर को
समर्थन प्रदान करते हुए शिरकत की थी l 'तहरीर' इन सभी संगठनों को उनके
सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है l इस सम्बन्ध में ज्ञापन को जिला
प्रशासन के माध्यम से भेजने के साथ साथ हमारे द्वारा सीधे उत्तर प्रदेश
के राज्यपाल महोदय को तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी प्रेषित कर दिया
गया है जो इस स्टेटस के साथ अपलोड किया जा रहा है।
यदि आपके पास भी मीडिया जगत से संबंधित कोई समाचार या फिर आलेख हो तो
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हैं। हम आपकी पहचान हमेशा गुप्त रखेंगे। - संपादक
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101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
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that i should delete your name from my mailing list.
Only 7% IAS officers filed property returns
http://www.sunday-guardian.com/news/only-7-ias-officers-filed-property-returns
Only 7% IAS officers filed property returns
Out of the serving 4,619 officers, only 311 IAS officers have filed the returns.
NAVTAN KUMAR New Delhi | 25th Oct 2014
DoPT's IPR rules are listed on its website.
everal Indian Administrative Service (IAS) officers are reluctant to
file annual property returns, a mandatory obligation under the Lokpal
and Lokayukta Act.
According to an RTI reply, the Department of Personnel and Training
(DoPT) has said that only "311 IAS officers have filed online property
returns in the prescribed format as mentioned in the Lokpal and
Lokayukta Act".
Though the sanctioned strength of the IAS is 6,270, the total number
of serving IAS officers in the country is 4,619, as per information
provided by the DoPT. That means only about 7% of them have filed
their returns.
In July, the DoPT under the Ministry of Personnel, Public Grievances
and Pensions, had issued a notification that under the Lokpal and
Lokayuktas Act, every public servant must every year file a
declaration, information and annual returns of his assets and
liabilities as of 31 March on or before 31 July. However, for the
current year, the last date of filing such returns was postponed to 15
September.
The government had introduced the facility of filing the returns
online, for which an application named Property Related Information
System (PRISM) has been designed.
"If IAS officers themselves do not follow the government's directives,
how can they expect others to do so?" asked Sanjay Sharma, the
Lucknow-based RTI activist who filed the query.
"Corruption is another aspect of this issue. The fact that they are
reluctant to share information about their property hints at possible
corruption. Our Prime Minister's USP is good governance. If IAS
officers conceal information about their property, how can Narendra
Modi's vision of providing good and efficient governance be realised?"
Sharma asked.
Only 7% IAS officers filed property returns
Out of the serving 4,619 officers, only 311 IAS officers have filed the returns.
NAVTAN KUMAR New Delhi | 25th Oct 2014
DoPT's IPR rules are listed on its website.
everal Indian Administrative Service (IAS) officers are reluctant to
file annual property returns, a mandatory obligation under the Lokpal
and Lokayukta Act.
According to an RTI reply, the Department of Personnel and Training
(DoPT) has said that only "311 IAS officers have filed online property
returns in the prescribed format as mentioned in the Lokpal and
Lokayukta Act".
Though the sanctioned strength of the IAS is 6,270, the total number
of serving IAS officers in the country is 4,619, as per information
provided by the DoPT. That means only about 7% of them have filed
their returns.
In July, the DoPT under the Ministry of Personnel, Public Grievances
and Pensions, had issued a notification that under the Lokpal and
Lokayuktas Act, every public servant must every year file a
declaration, information and annual returns of his assets and
liabilities as of 31 March on or before 31 July. However, for the
current year, the last date of filing such returns was postponed to 15
September.
The government had introduced the facility of filing the returns
online, for which an application named Property Related Information
System (PRISM) has been designed.
"If IAS officers themselves do not follow the government's directives,
how can they expect others to do so?" asked Sanjay Sharma, the
Lucknow-based RTI activist who filed the query.
"Corruption is another aspect of this issue. The fact that they are
reluctant to share information about their property hints at possible
corruption. Our Prime Minister's USP is good governance. If IAS
officers conceal information about their property, how can Narendra
Modi's vision of providing good and efficient governance be realised?"
Sharma asked.
Wednesday, 22 October 2014
सोचिये मोहान रोड स्थित गोविन्द बल्लभ पंत पालीटेक्निक के छात्रों को क्या और कैसी शिक्षा देता होगा अखिलेश राज के भ्रष्ट आईएएस अधिकारी प्रमुख सचिव समाज कल्याण सुनील कुमार का कृपापात्र ये श्री ४२० अध्यापक पवन कुमार मिश्रा ?
सोचिये मोहान रोड स्थित गोविन्द बल्लभ पंत पालीटेक्निक के छात्रों को
क्या और कैसी शिक्षा देता होगा अखिलेश राज के भ्रष्ट आईएएस अधिकारी
प्रमुख सचिव समाज कल्याण सुनील कुमार का कृपापात्र ये श्री ४२० अध्यापक
पवन कुमार मिश्रा ?
================================================================
पाॅलीटेक्निक का कार्यशाला अधीक्षक कोर्ट में तलब
लखनऊ (ब्यूरो)। फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे पालीटेक्निक कॉलेज में नौकरी
करने के आरोपों को लेकर राजकीय गोविन्द बल्लब पंत पालीटेक्निक के
कार्यशाला अधीक्षक पवन कुमार मिश्रा के खिलाफ सीजेएम सुनील कुमार ने
सम्मन जारी किया है। कोर्ट ने आरोपी को तलब करते हुए मामले की सुनवाई के
लिए 22 नवंबर की तारीख तय की है।
पत्रावली के अनुसार राजाजीपुरम की रहने वाली उर्वशी शर्मा ने 28 जनवरी
2008 को काकोरी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसके पति संजय शर्मा का
चयन 29 जून 1995 को लोक सेवा आयोग से हो गया था। इसी बीच मोहान रोड स्थित
गोविन्द बल्लभ पंत पालीटेक्निक में 40 रुपये प्रति कक्षा के हिसाब से
पढ़ा रहे पवन कुमार मिश्रा ने हाईकोर्ट में खुद को बेरोजगार तथा मैकेनिकल
इंजीनियर बताकर नियुक्ति पर स्टे ले लिया था। कहा गया कि पवन मिश्रा ने
खुद को मैकेनिकल इंजीनियर बताया जबकि वह प्रोडक्शन में इंजीनियर है। आरोप
लगाया गया कि पवन मिश्रा ने नौकरी प्राप्त करने के लिए जिस समयावधि में
खुद को बेरोजगार बताया था उसी समय वह अवध इंडस्ट्रीज का कार्य अनुभव का
प्रमाण पत्र लगाकर सेवा लाभ ले लिया। इस वजह से संजय शर्मा को 5 वर्ष से
अधिक समय तक सेवा से वंचित रहना पड़ा।
काकोरी पुलिस ने मामले की विवेचना के बाद 20 सितंबर 2008 को मामले में
फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी। जिसको उर्वशी शर्मा द्वारा चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने वादिनी के पेश किए साक्ष्य देखने के बाद पवन कुमार मिश्रा को
प्रथम दृष्टया आरोपी पाते हुए तलब किया है।
http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20141021g_006163009&ileft=619&itop=403&zoomRatio=211&AN=20141021g_006163009
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
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क्या और कैसी शिक्षा देता होगा अखिलेश राज के भ्रष्ट आईएएस अधिकारी
प्रमुख सचिव समाज कल्याण सुनील कुमार का कृपापात्र ये श्री ४२० अध्यापक
पवन कुमार मिश्रा ?
================================================================
पाॅलीटेक्निक का कार्यशाला अधीक्षक कोर्ट में तलब
लखनऊ (ब्यूरो)। फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे पालीटेक्निक कॉलेज में नौकरी
करने के आरोपों को लेकर राजकीय गोविन्द बल्लब पंत पालीटेक्निक के
कार्यशाला अधीक्षक पवन कुमार मिश्रा के खिलाफ सीजेएम सुनील कुमार ने
सम्मन जारी किया है। कोर्ट ने आरोपी को तलब करते हुए मामले की सुनवाई के
लिए 22 नवंबर की तारीख तय की है।
पत्रावली के अनुसार राजाजीपुरम की रहने वाली उर्वशी शर्मा ने 28 जनवरी
2008 को काकोरी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसके पति संजय शर्मा का
चयन 29 जून 1995 को लोक सेवा आयोग से हो गया था। इसी बीच मोहान रोड स्थित
गोविन्द बल्लभ पंत पालीटेक्निक में 40 रुपये प्रति कक्षा के हिसाब से
पढ़ा रहे पवन कुमार मिश्रा ने हाईकोर्ट में खुद को बेरोजगार तथा मैकेनिकल
इंजीनियर बताकर नियुक्ति पर स्टे ले लिया था। कहा गया कि पवन मिश्रा ने
खुद को मैकेनिकल इंजीनियर बताया जबकि वह प्रोडक्शन में इंजीनियर है। आरोप
लगाया गया कि पवन मिश्रा ने नौकरी प्राप्त करने के लिए जिस समयावधि में
खुद को बेरोजगार बताया था उसी समय वह अवध इंडस्ट्रीज का कार्य अनुभव का
प्रमाण पत्र लगाकर सेवा लाभ ले लिया। इस वजह से संजय शर्मा को 5 वर्ष से
अधिक समय तक सेवा से वंचित रहना पड़ा।
काकोरी पुलिस ने मामले की विवेचना के बाद 20 सितंबर 2008 को मामले में
फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी। जिसको उर्वशी शर्मा द्वारा चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने वादिनी के पेश किए साक्ष्य देखने के बाद पवन कुमार मिश्रा को
प्रथम दृष्टया आरोपी पाते हुए तलब किया है।
http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20141021g_006163009&ileft=619&itop=403&zoomRatio=211&AN=20141021g_006163009
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Sunday, 19 October 2014
तहरीर' के धरने और सूचना आयुक्तों को चुनौती देने से दबाब में आयी सरकार ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना आयुक्त के चयन के लिए बीते बृहस्पतिवार होने वाली बैठक स्थगित
Taken From Facebook wall of Sanjay Sharma
'तहरीर' के धरने और सूचना आयुक्तों को चुनौती देने से दबाब में आयी सरकार
ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना आयुक्त के चयन के लिए
बीते बृहस्पतिवार होने वाली बैठक स्थगित कर दी है l 'तहरीर' के विरोध के
चलते ही यह बैठक इसके पहले भी एक बार स्थगित हो चुकी है।
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना
आयुक्तका पद 30 जून 2014 से खाली है। इससे पहले सरकार ने इन दोनों पदों
पर चयन के लिए पहले 28 जून 2014 को चयन समिति की बैठक बुलाई थी जिसमें
बिना आवेदन के सीधे चयन समिति द्वारा इन दोनों पदों पर चयन की तैयारी थी
जिसका हमारे द्वारा कड़ा विरोध किया गया था और पूर्व की भांति आवेदन
मंगाने की मांग की गयी थी l हमारे दबाब में यह बैठक स्थगित कर दी गई थी
और प्रशासनिक सुधार विभाग द्वारा बीते अगस्त में इन दोनों पदों पर चयन के
लिए आवेदन मांगे गए थे l
लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर दिनांक
12 अक्टूबर 2014 को राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान धरना स्थल पर
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना
और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते
हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती के कार्यक्रम का
आयोजन येश्वर्याज सेवा संस्थान, एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन ,
आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी , ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार
कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम, मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन
सूचना अधिकार जागरूकता मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी
मेमोरियल समाज सेवा संस्थान , आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड
ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही
भारत निर्माण मंच आदि संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया l
कार्यक्रम में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया लखनऊ चैप्टर, सोसाइटी फॉर
फ़ास्ट जस्टिस लखनऊ और उत्तर प्रदेश रोडवेज संविदा कर्मचारी संघ ने भी
तहरीर को समर्थन प्रदान करते हुए शिरकत की थी l 'तहरीर' इन सभी संगठनों
को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है l इस सम्बन्ध में ज्ञापन
को जिला प्रशासन के माध्यम से भेजने के साथ साथ हमारे द्वारा सीधे उत्तर
प्रदेश के राज्यपाल महोदय को तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी प्रेषित
कर दिया गया है जो इस स्टेटस के साथ अपलोड किया जा रहा है l
'तहरीर' के धरने और सूचना आयुक्तों को चुनौती देने से दबाब में आयी सरकार
ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना आयुक्त के चयन के लिए
बीते बृहस्पतिवार होने वाली बैठक स्थगित कर दी है l 'तहरीर' के विरोध के
चलते ही यह बैठक इसके पहले भी एक बार स्थगित हो चुकी है।
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना
आयुक्तका पद 30 जून 2014 से खाली है। इससे पहले सरकार ने इन दोनों पदों
पर चयन के लिए पहले 28 जून 2014 को चयन समिति की बैठक बुलाई थी जिसमें
बिना आवेदन के सीधे चयन समिति द्वारा इन दोनों पदों पर चयन की तैयारी थी
जिसका हमारे द्वारा कड़ा विरोध किया गया था और पूर्व की भांति आवेदन
मंगाने की मांग की गयी थी l हमारे दबाब में यह बैठक स्थगित कर दी गई थी
और प्रशासनिक सुधार विभाग द्वारा बीते अगस्त में इन दोनों पदों पर चयन के
लिए आवेदन मांगे गए थे l
लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर दिनांक
12 अक्टूबर 2014 को राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान धरना स्थल पर
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना
और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते
हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती के कार्यक्रम का
आयोजन येश्वर्याज सेवा संस्थान, एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन ,
आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी , ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार
कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम, मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन
सूचना अधिकार जागरूकता मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी
मेमोरियल समाज सेवा संस्थान , आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड
ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही
भारत निर्माण मंच आदि संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया l
कार्यक्रम में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया लखनऊ चैप्टर, सोसाइटी फॉर
फ़ास्ट जस्टिस लखनऊ और उत्तर प्रदेश रोडवेज संविदा कर्मचारी संघ ने भी
तहरीर को समर्थन प्रदान करते हुए शिरकत की थी l 'तहरीर' इन सभी संगठनों
को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है l इस सम्बन्ध में ज्ञापन
को जिला प्रशासन के माध्यम से भेजने के साथ साथ हमारे द्वारा सीधे उत्तर
प्रदेश के राज्यपाल महोदय को तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी प्रेषित
कर दिया गया है जो इस स्टेटस के साथ अपलोड किया जा रहा है l
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के भाई के ससुर को सूचना आयुक्त नियुक्त करने का उदाहरण देते हुए सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद रोकने के लिए नियमों में संशोधन करने की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर
http://www.livehindustan.com/news/desh/deshlocalnews/article1--39-0-457320.html
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महाराष्ट्र में भाजपा को शुरुआती बढ़त, हरियाणा में भी आगे नतीजा लाइव:
महाराष्ट्र में भाजपा को शुरुआती बढ़त, हरियाणा में भी आगे नतीजा लाइव:
महाराष्ट्र में भाजपा को शुरुआती बढ़त, हरियाणा में भी आगे डीजी पर
आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप जम्मू-कश्मीर में चुनाव तारीख पर
और विचार करेगा आयोग हरियाणा में निर्दलियों से सम्पर्क साध रही है भाजपा
मोदी सरकार की राह में रोड़ा नहीं अटकाना चाहता संघ मोदी सरकार की राह
में रोड़ा नहीं अटकाना चाहता संघ मोदी सरकार की राह में रोड़ा नहीं
अटकाना चाहता संघ
सूचना आयोग में भाई-भतीजावाद रोकने की मांग
नई दिल्ली, श्याम सुमन
First Published:18-10-14 09:22 PM
Last Updated:18-10-14 09:22 PM
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के भाई के ससुर को सूचना आयुक्त नियुक्त
करने का उदाहरण देते हुए सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति
में भाई-भतीजावाद रोकने के लिए नियमों में संशोधन करने की याचिका सुप्रीम
कोर्ट में दायर की गई है।
लोक प्रहरी संगठन ने याचिका में कहा है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के
नियमों में उम्मीदवारों के लिए सार्वजनिक जीवन में 'ख्यातिलब्ध हस्ती' की
परिभाषा स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि इस श्रेणी के तहत सरकारें अपनी मर्जी
के व्यक्तियों को सूचना आयुक्त बना रही हैं, जो न तो स्वतंत्र हैं और न
ही निष्पक्ष। इस प्रक्रिया में पारदिर्शता है, क्योंकि शार्ट लिस्ट किए
गए लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जाते।
लोकप्रहरी के संगठन के संयोजक तथा पूर्व आईएएस एसएन शुक्ला ने कहा कि
याचिका में यूपी में हाल ही में आठ सूचना आयुक्त नियुक्त किए गए हैं,
जिन्हें हाईकोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम
कोर्ट इस बारे में कानून बना सकता है, क्योंकि सूचना के अधिकार कानून के
तहत नियुक्तियों के बारे में नियम अब तक नहीं बनाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट
कई फैसलों में तय कर चुका है कि जहां विधायिका ने कानून नहीं बनाया है,
वहां नागरिकों के मौलिक अधिकारों को संरक्षित करने के लिए न्यायिक
हस्तक्षेप से कानून बनाए जा सकते हैं।
याचिका में शुक्ला ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में 'ख्यातिलब्ध हस्ती' में
सामाजिक कार्यो में पद्मभूषण या पद्मविभूषण, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय
पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों को रखना चाहिए। साथ ही उन्हें व्यापक ज्ञान
और अनुभव भी होना चाहिए। यह योग्यता ऐसी हो जिसकी पुष्टि की जा सके।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एचएल दत्तू की पीठ इस याचिका पर 15 दिसंबर को
सुनवाई करेगी। लोकप्रहरी की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट गत वर्ष आपराधिक
मामलों में दंडित जनप्रतिनिधियों को तुरंत प्रभाव से अयोग्य घोषित करने
का फैसला दिया था।
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
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और विचार करेगा आयोग हरियाणा में निर्दलियों से सम्पर्क साध रही है भाजपा
मोदी सरकार की राह में रोड़ा नहीं अटकाना चाहता संघ मोदी सरकार की राह
में रोड़ा नहीं अटकाना चाहता संघ मोदी सरकार की राह में रोड़ा नहीं
अटकाना चाहता संघ
सूचना आयोग में भाई-भतीजावाद रोकने की मांग
नई दिल्ली, श्याम सुमन
First Published:18-10-14 09:22 PM
Last Updated:18-10-14 09:22 PM
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के भाई के ससुर को सूचना आयुक्त नियुक्त
करने का उदाहरण देते हुए सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति
में भाई-भतीजावाद रोकने के लिए नियमों में संशोधन करने की याचिका सुप्रीम
कोर्ट में दायर की गई है।
लोक प्रहरी संगठन ने याचिका में कहा है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के
नियमों में उम्मीदवारों के लिए सार्वजनिक जीवन में 'ख्यातिलब्ध हस्ती' की
परिभाषा स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि इस श्रेणी के तहत सरकारें अपनी मर्जी
के व्यक्तियों को सूचना आयुक्त बना रही हैं, जो न तो स्वतंत्र हैं और न
ही निष्पक्ष। इस प्रक्रिया में पारदिर्शता है, क्योंकि शार्ट लिस्ट किए
गए लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जाते।
लोकप्रहरी के संगठन के संयोजक तथा पूर्व आईएएस एसएन शुक्ला ने कहा कि
याचिका में यूपी में हाल ही में आठ सूचना आयुक्त नियुक्त किए गए हैं,
जिन्हें हाईकोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम
कोर्ट इस बारे में कानून बना सकता है, क्योंकि सूचना के अधिकार कानून के
तहत नियुक्तियों के बारे में नियम अब तक नहीं बनाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट
कई फैसलों में तय कर चुका है कि जहां विधायिका ने कानून नहीं बनाया है,
वहां नागरिकों के मौलिक अधिकारों को संरक्षित करने के लिए न्यायिक
हस्तक्षेप से कानून बनाए जा सकते हैं।
याचिका में शुक्ला ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में 'ख्यातिलब्ध हस्ती' में
सामाजिक कार्यो में पद्मभूषण या पद्मविभूषण, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय
पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों को रखना चाहिए। साथ ही उन्हें व्यापक ज्ञान
और अनुभव भी होना चाहिए। यह योग्यता ऐसी हो जिसकी पुष्टि की जा सके।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एचएल दत्तू की पीठ इस याचिका पर 15 दिसंबर को
सुनवाई करेगी। लोकप्रहरी की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट गत वर्ष आपराधिक
मामलों में दंडित जनप्रतिनिधियों को तुरंत प्रभाव से अयोग्य घोषित करने
का फैसला दिया था।
--
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Urvashi Sharma
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Thursday, 16 October 2014
आरटीआई विशेषज्ञ संजय की चुनौती पर सामने नहीं आया यूपी का कोई सूचना आयुक्त!
आरटीआई विशेषज्ञ संजय की चुनौती पर सामने नहीं आया यूपी का कोई सूचना आयुक्त!
Posted On 14 October 2014, By Dialogue India
आज आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान
धरना स्थल पर पूर्वान्ह 11 बजे से अपरान्ह 03 बजे तक संस्था 'येश्वर्याज
सेवा संस्थान' द्वारा जनसुनवाई और जनजागरूकता कैंप का आयोजन किया गया तो
वही लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के
निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना
आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली
बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा द्वारा दी गयी चुनौती के कार्यक्रम
का आयोजन एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन, आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी,
ट्रैप संस्था अलीगढ, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम,
मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन सूचना अधिकार जागरूकता मंच,
भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच, एसआरपीडी मेमोरियल समाज सेवा संस्थान, आल
इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर
एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत निर्माण मंच आदि
संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया l कार्यक्रम की अध्यक्षता तहरीर
संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष ईo संजय शर्मा ने की l संजय शर्मा की
गिनती देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है और उत्तर प्रदेश
में आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा प्रदेश के सभी आरटीआई
कार्यकर्ता मानते हैं l कार्यक्रम में प्रतिभागी संगठनों के प्रतिनिधियों
के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने
प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने लोगों को आरटीआई के
जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही जनसुनवाई में
जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना आयोग की आरटीआई एक्ट के
क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी समस्याएं आरटीआई
विशेषज्ञों के साथ साझा कर समस्याओ के समाधान के सम्बन्ध में मार्गदर्शन
प्राप्त किया l संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने अपनी मांगों के
सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सम्बोधित एक मांगपत्र
हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया l कार्यक्रम में कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स
इनिशिएटिव नई दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क उपलब्ध कराई गयी
आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया l
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में
पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के
संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था
'तहरीर' को प्राप्त प्रमाणों के आधार पर उन्हें यह कहने में कोई गुरेज
नहीं है कि सूचना आयुक्तों की अक्षमता के कारण ही आरटीआई के तहत सूचना
दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के मार्ग की सबसे बड़ी
वाधा बन गयी है l संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की पोल-पट्टी खोलकर
इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने यूपी के हालिया
कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के
सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और कहा कि इन आयुक्तों से हार
जाने की दशा में उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर सजाये मौत तक की हर
सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया कि चुनौती के
सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को 2 ई-मेल दिनांक 09-10-14 और
10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग
के सचिव के कार्यालय में दिनांक 10-10-14 को एक तीन पेज का चुनौती पत्र
व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर भी प्राप्त करा दिया है l संजय ने बताया कि
उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्तों में से कोई
भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में से 10% भी योग्यता
धारित नहीं करते है l संजय बताते हैं कि प्रदेश के सूचना आयुक्त का पद
मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि क्या यह माना जा सकता
है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9 मुख्य सचिव कार्यरत हों
वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1 मुख्य सचिव पूरा सूबा
संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते हैं कि ऐसा इसलिए है
क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त नितांत अयोग्य हैं और वे
मात्र अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह महत्वपूर्ण पद पा गए हैं l
बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और अपने राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते
ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च
पद को कलंकित कर रहे हैं l
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा ने बताया कि उनकी खुली बहस की चुनौती पर आज
यूपी का कोई भी सूचना आयुक्तसामने नहीं आया l संजय ने अब अयोग्य सूचना
आयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका दायर
करने का निर्णय लिया है l
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग स्वयं
ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है l उर्वशी ने कहा कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में
55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में
सर्वाधिक हैं l नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है और
आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर
रहा है जिसके कारण उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में ही सूचना
का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका है l
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद हुए संगठनों ने एक सुर से
सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि में
चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के
अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों की
विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने , सूचना आयुक्तों के
रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति कराने , 55000 से अधिक लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां
शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल
लागू कराने,आयोग में नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1 सप्ताह
के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह के
अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे जाने
की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने , अपीलों और
शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम 30 दिन बाद की देने,सूचना
आयुक्तों और नागरिकों/ आरटीआई कार्यकर्ताओं के पारस्परिक संवाद की
प्रणाली विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को
जनहित के लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने, सूचना
आयोग में वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा कर के
सुनवाई करने के स्थान पर कुर्सी पर बैठाकर सुनवाई कराने, वादियों को झूठे
मामलों में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव करने के लिए वादी
द्वारा मांगे जाने पर आयोग की सीसीटीवी फुटेज तत्काल उपलब्ध कराने,
आयुक्तों द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की सुविधानुसार बदलने की
प्रवृत्ति रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की शॉर्टहैंड बुक पर पेंसिल के
स्थान पर पेन से लिखना अनिवार्य करने तथा शॉर्टहैंड बुक पर उपस्थित वादी
और प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने , आयुक्तों द्वारा दण्डादेशों को बापस
लेने के असंवैधानिक कारनामों पर तत्काल रोक लगाने, कार्यस्थल पर यौन
उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत तत्काल समिति बनाकर इस समिति द्वारा अब तक
सूचना आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं द्वारा की गयी उत्पीड़न की शिकायतों की
तत्काल जांच कराने, आयोग के कार्यालयीन कार्यों की लिखित प्रक्रिया बनाये
जाने, आयोग के द्वारा सम्पादित कार्यों की मासिक रिपोर्ट तैयार कराकर
स्वतः ही सार्वजनिक कराने आदि मांगों के साथ धरना देते हुए राज्यपाल को
एक ज्ञापन भी प्रेषित किया l
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी
शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी
मांगें न माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को साथ लेकर सूचना
आयोग और प्रदेश सरकार के खिलाफ वृहद स्तर पर उग्र आंदोलन करने को तैयार
रहने का आव्हान किया l
CURRENT ISSUE
October 2014
SPECIAL ISSUE
http://www.dialogueindia.in/magazine/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%86%E0%A4%88-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88-%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4!-1884
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Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
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Posted On 14 October 2014, By Dialogue India
आज आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान
धरना स्थल पर पूर्वान्ह 11 बजे से अपरान्ह 03 बजे तक संस्था 'येश्वर्याज
सेवा संस्थान' द्वारा जनसुनवाई और जनजागरूकता कैंप का आयोजन किया गया तो
वही लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के
निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना
आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली
बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा द्वारा दी गयी चुनौती के कार्यक्रम
का आयोजन एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन, आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी,
ट्रैप संस्था अलीगढ, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम,
मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन सूचना अधिकार जागरूकता मंच,
भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच, एसआरपीडी मेमोरियल समाज सेवा संस्थान, आल
इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर
एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत निर्माण मंच आदि
संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया l कार्यक्रम की अध्यक्षता तहरीर
संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष ईo संजय शर्मा ने की l संजय शर्मा की
गिनती देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है और उत्तर प्रदेश
में आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा प्रदेश के सभी आरटीआई
कार्यकर्ता मानते हैं l कार्यक्रम में प्रतिभागी संगठनों के प्रतिनिधियों
के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने
प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने लोगों को आरटीआई के
जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही जनसुनवाई में
जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना आयोग की आरटीआई एक्ट के
क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी समस्याएं आरटीआई
विशेषज्ञों के साथ साझा कर समस्याओ के समाधान के सम्बन्ध में मार्गदर्शन
प्राप्त किया l संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने अपनी मांगों के
सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सम्बोधित एक मांगपत्र
हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया l कार्यक्रम में कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स
इनिशिएटिव नई दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क उपलब्ध कराई गयी
आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया l
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में
पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के
संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था
'तहरीर' को प्राप्त प्रमाणों के आधार पर उन्हें यह कहने में कोई गुरेज
नहीं है कि सूचना आयुक्तों की अक्षमता के कारण ही आरटीआई के तहत सूचना
दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के मार्ग की सबसे बड़ी
वाधा बन गयी है l संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की पोल-पट्टी खोलकर
इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने यूपी के हालिया
कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के
सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और कहा कि इन आयुक्तों से हार
जाने की दशा में उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर सजाये मौत तक की हर
सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया कि चुनौती के
सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को 2 ई-मेल दिनांक 09-10-14 और
10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग
के सचिव के कार्यालय में दिनांक 10-10-14 को एक तीन पेज का चुनौती पत्र
व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर भी प्राप्त करा दिया है l संजय ने बताया कि
उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्तों में से कोई
भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में से 10% भी योग्यता
धारित नहीं करते है l संजय बताते हैं कि प्रदेश के सूचना आयुक्त का पद
मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि क्या यह माना जा सकता
है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9 मुख्य सचिव कार्यरत हों
वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1 मुख्य सचिव पूरा सूबा
संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते हैं कि ऐसा इसलिए है
क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त नितांत अयोग्य हैं और वे
मात्र अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह महत्वपूर्ण पद पा गए हैं l
बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और अपने राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते
ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च
पद को कलंकित कर रहे हैं l
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा ने बताया कि उनकी खुली बहस की चुनौती पर आज
यूपी का कोई भी सूचना आयुक्तसामने नहीं आया l संजय ने अब अयोग्य सूचना
आयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका दायर
करने का निर्णय लिया है l
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग स्वयं
ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है l उर्वशी ने कहा कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में
55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में
सर्वाधिक हैं l नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है और
आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर
रहा है जिसके कारण उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में ही सूचना
का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका है l
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद हुए संगठनों ने एक सुर से
सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि में
चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के
अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों की
विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने , सूचना आयुक्तों के
रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति कराने , 55000 से अधिक लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां
शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल
लागू कराने,आयोग में नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1 सप्ताह
के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह के
अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे जाने
की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने , अपीलों और
शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम 30 दिन बाद की देने,सूचना
आयुक्तों और नागरिकों/ आरटीआई कार्यकर्ताओं के पारस्परिक संवाद की
प्रणाली विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को
जनहित के लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने, सूचना
आयोग में वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा कर के
सुनवाई करने के स्थान पर कुर्सी पर बैठाकर सुनवाई कराने, वादियों को झूठे
मामलों में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव करने के लिए वादी
द्वारा मांगे जाने पर आयोग की सीसीटीवी फुटेज तत्काल उपलब्ध कराने,
आयुक्तों द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की सुविधानुसार बदलने की
प्रवृत्ति रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की शॉर्टहैंड बुक पर पेंसिल के
स्थान पर पेन से लिखना अनिवार्य करने तथा शॉर्टहैंड बुक पर उपस्थित वादी
और प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने , आयुक्तों द्वारा दण्डादेशों को बापस
लेने के असंवैधानिक कारनामों पर तत्काल रोक लगाने, कार्यस्थल पर यौन
उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत तत्काल समिति बनाकर इस समिति द्वारा अब तक
सूचना आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं द्वारा की गयी उत्पीड़न की शिकायतों की
तत्काल जांच कराने, आयोग के कार्यालयीन कार्यों की लिखित प्रक्रिया बनाये
जाने, आयोग के द्वारा सम्पादित कार्यों की मासिक रिपोर्ट तैयार कराकर
स्वतः ही सार्वजनिक कराने आदि मांगों के साथ धरना देते हुए राज्यपाल को
एक ज्ञापन भी प्रेषित किया l
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी
शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी
मांगें न माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को साथ लेकर सूचना
आयोग और प्रदेश सरकार के खिलाफ वृहद स्तर पर उग्र आंदोलन करने को तैयार
रहने का आव्हान किया l
CURRENT ISSUE
October 2014
SPECIAL ISSUE
http://www.dialogueindia.in/magazine/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%86%E0%A4%88-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88-%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4!-1884
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-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
http://upcpri.blogspot.in/
Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
that i should delete your name from my mailing list.
Tuesday, 14 October 2014
दस साल में निकला दम
दस साल में निकला दम
http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/guestcolumn/article1-Well-known-British-poet-scholar-Richard-Garnet-50-62-456122.html
फरजंद अहमद, पूर्व सूचना आयुक्त, बिहार
First Published:12-10-14 09:10 PM
Last Updated:12-10-14 09:10 PM
जाने-माने ब्रिटिश कवि और स्कॉलर रिचर्ड गारनेट ने एक बार कहा था कि हर
परदे की ख्वाहिश होती है कि कोई उसे बेपरदा करे, सिवाय पाखंड के परदे का।
पाखंड का परदा व्यवस्था के चेहरे से उठे या न उठे, मगर सूचना के अधिकार
का इस्तेमाल करने वालों के बीच फैलता खौफ और सरकारी कामकाज में
पारदर्शिता की गारंटी देने वाला सूचना अधिकार कानून खुद पाखंड के परदे के
भीतर दम तोड़ रहा है। आज आरटीआई की दसवीं वर्षगांठ है, मगर पहली बार
केंद्रीय सूचना आयोग में न तो कोई शिकवा-शिकायत करने वाला होगा और न ही
सूचना का अधिकार, यानी सनशाइन कानून पर मंडराते स्याह बादलों पर कोई
चर्चा होगी। केवल बंद कमरे में एक औपचारिकता पूरी की जाएगी, क्योंकि
केंद्रीय सूचना आयोग में फिलहाल कोई मुख्य सूचना आयुक्त नहीं। पहले
राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री इसका उद्घाटन करते थे और सरकार की नजर में इस
कानून की कमजोरियों या उपलब्धि पर बहस की शुरुआत करते थे, लेकिन नई सरकार
को इतनी फुरसत नहीं मिली कि वह मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर सके।
जो कानून अब तक जनता के हाथ में एक धारदार हथियार था, प्रजातंत्र के लिए
ऑक्सीजन था, उस हथियार की धार दस वर्षों में ही कुंद हो चुकी है। सरकारें
या प्रशासन हर आवेदक को शक की नजरों से देखते हैं, इसलिए लोक सूचना
पदाधिकारी सूचना देने से कतराते हैं या फिर उन्हें दौड़ाते रहते हैं।
नतीजा यह है कि वादों का अंबार आकाश छू रहा है। आवेदक अपनी अपील लेकर
आयोग का चक्कर काटते-काटते थकते जा रहे हैं। युवा सामाजिक कार्यकर्ता
उत्कर्ष सिन्हा को लगता है कि अब हर आवेदक राग दरबारी का बेबस लंगड़
बनकर रह जाएगा, जिसने पूरी जिंदगी एक दस्तावेज की नकल के लिए गंवा दी थी।
आरटीआई असेसमेंट और एडवोकेसी ग्रुप और समय-सेंटर फॉर इक्विटीज के अनुसार,
आज सूचना आयोगों में करीब दो लाख वाद सुनवाई के लिए तरस रहे हैं। अध्ययन
के अनुसार, मध्य प्रदेश में यदि आज कोई अपील दाखिल करता है, तो 60 साल
बाद उसका नंबर आएगा। वहीं पश्चिम बंगाल में उसे 17 साल, राजस्थान में तीन
साल, असम और केरल में दो साल इंतजार करना होगा। खुद केंद्रीय सूचना आयोग
में 26,115 मामले लंबित हैं।
अध्ययन के अनुसार, सबसे अधिक मामले सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में
लंबित हैं। इनकी संख्या 48,442 है, जबकि महाराष्ट्र सूचना मांगने वालों
की हत्या और उत्पीड़न में पूरे देश में अव्वल नंबर पर है। कॉमनवेल्थ
ह्यूमन राइट इनीशिएटिव के अनुसार, महाराष्ट्र में अब तक 53 आवेदकों पर
जानलेवा हमले हो चुके हैं, जिनमें नौ लोगों की जान जा चुकी है, जबकि
बिहार में छह लोग सूचना मांगने के कारण मारे गए हैं। जाने-माने आरटीआई
एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय (जिन्होंने सूचना मांगने के कारण झूठे मामले
में कई महीने जेल में गुजारे थे) के अनुसार, बिहार में आवेदकों पर अब
हमले कुछ कम इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि दहशत के कारण लोग सूचना मांगने के
पहले कई बार सोचते हैं। महाराष्ट्र के बाद गुजरात का नंबर आता है, जहां
34 कार्यकर्ताओं पर हमले हो चुके हैं। उनमें से तीन मारे जा चुके हैं।
मगर उत्तर प्रदेश में सूचना की बदहाली नई मिसाल कायम कर रही है। यहां
फिलहाल नौ सूचना आयुक्त हैं, जिनकी काबिलियत और उदासीनता पर चर्चा चल रही
है। अन्य संस्थानों के साथ-साथ एक्टिविस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी
शर्मा ने यूपी के सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए नौ
आयुक्तों को खुली बहस की चुनौती दी है। सामाजिक कार्यकर्ता, आरटीआई
विशेषज्ञ और 'तहरीर' के संस्थापक अध्यक्ष संजय शर्मा ने भी वर्तमान सूचना
आयुक्तों से एक साथ अकेले या खुली बहस करने की चुनौती दी है। पिछले तीन
वर्षों से केंद्र सरकार सूचना का अधिकार कानून को नई ताकत देने के नाम पर
इसे कमजोर करने का काम कर रही थी। साल 2011 में केंद्रीय सूचना आयोग ने
तत्कालीन राष्ट्रपति (प्रतिभा पाटिल) को अपनी संपत्ति का ब्योरा देने का
आदेश दिया था। उन्हीं दिनों 2-जी स्पेक्ट्रम के संबंध में तत्कालीन वित्त
मंत्री प्रणब मुखर्जी (अब राष्ट्रपति) की फाइल टिप्पणी को सरेआम करना
पड़ा था। फिर रॉबर्ट वाड्रा की लैंड डील का मामला आरटीआई के माध्यम से
उछला।
इन सबका असर सरकार पर दिखाई पड़ा। 15 अक्तूबर, 2011 को केंद्रीय सूचना
आयोग के सालाना सम्मलेन में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था
कि अब हमें सूचना के अधिकार कानून पर आलोचनात्मक रुख अपनाना होगा..,
आरटीआई का सरकारी विचार-विमर्श की प्रक्रिया पर उल्टा असर नहीं पड़ना
चाहिए। फिर अगले साल 12 अक्तूबर, 2012 को मनमोहन सिंह ने कहा कि निजता का
उल्लंघन करने वाली बेहूदा और परेशान करने वाली आरटीआई आवेदनों को लेकर
चिंता पैदा हो रही है। ठीक इसके बाद ही खबर आई थी कि केंद्र सरकार ने यह
फैसला किया है कि वह एक समिति गठित कर यह पता लगाएगी कि सूचना एकत्र करने
और देने पर सरकार का कितना खर्च आता है।
इस तरह की बात सूचना के अधिकार अधिनियम की आत्मा के खिलाफ है, क्योंकि इस
कानून की धारा 7(3) साफ तौर पर कहती कि सूचना की कॉपी पर खर्च आवेदक को
ही वहन करना होगा। साफ है कि दस साल के भीतर ही इसे कमजोर करने की कवायद
शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के कई
फैसलों ने आवेदकों के बीच खलबली मचा दी थी। दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने
एक फैसला सुनाया था कि हर सूचना आयोग दो-आयुक्तों का पीठ होगा, जिसमें एक
हाई कोर्ट के जज होंगे। मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर कोई जज ही होगा। इस
आदेश के बाद कई राज्य आयोग का कामकाज बंद हो गया। बाद में खुद सुप्रीम
कोर्ट ने इस फैसले को 'मिस्टेक ऑफ लॉ' कहकर वापस ले लिया। बिहार सहित कई
राज्यों में धारा 20 के तहत लगाए गए दंड की सही तरीके से वसूली नहीं
होती, जिसके कारण लोक सूचना पदाधिकारियों का मनोबल बढ़ता जा रहा है और
आवेदक भटक रहे हैं। आज दुनिया के लगभग 100 देशों में सूचना का अधिकार
कानून लागू है। दक्षिण एशिया में भारत का कानून सबसे कारगर था, क्योंकि
खुद कार्यकर्ताओं ने इसकी रचना की थी और केंद्र सरकार ने भी इसे लागू
करने में खासी दिलचस्पी दिखाई थी। मगर अब जब सूचना का अधिकार कानून खुद
सरकारों के गले की हड्डी बन चुका है, तब कौन बचाए इसे?
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
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फरजंद अहमद, पूर्व सूचना आयुक्त, बिहार
First Published:12-10-14 09:10 PM
Last Updated:12-10-14 09:10 PM
जाने-माने ब्रिटिश कवि और स्कॉलर रिचर्ड गारनेट ने एक बार कहा था कि हर
परदे की ख्वाहिश होती है कि कोई उसे बेपरदा करे, सिवाय पाखंड के परदे का।
पाखंड का परदा व्यवस्था के चेहरे से उठे या न उठे, मगर सूचना के अधिकार
का इस्तेमाल करने वालों के बीच फैलता खौफ और सरकारी कामकाज में
पारदर्शिता की गारंटी देने वाला सूचना अधिकार कानून खुद पाखंड के परदे के
भीतर दम तोड़ रहा है। आज आरटीआई की दसवीं वर्षगांठ है, मगर पहली बार
केंद्रीय सूचना आयोग में न तो कोई शिकवा-शिकायत करने वाला होगा और न ही
सूचना का अधिकार, यानी सनशाइन कानून पर मंडराते स्याह बादलों पर कोई
चर्चा होगी। केवल बंद कमरे में एक औपचारिकता पूरी की जाएगी, क्योंकि
केंद्रीय सूचना आयोग में फिलहाल कोई मुख्य सूचना आयुक्त नहीं। पहले
राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री इसका उद्घाटन करते थे और सरकार की नजर में इस
कानून की कमजोरियों या उपलब्धि पर बहस की शुरुआत करते थे, लेकिन नई सरकार
को इतनी फुरसत नहीं मिली कि वह मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर सके।
जो कानून अब तक जनता के हाथ में एक धारदार हथियार था, प्रजातंत्र के लिए
ऑक्सीजन था, उस हथियार की धार दस वर्षों में ही कुंद हो चुकी है। सरकारें
या प्रशासन हर आवेदक को शक की नजरों से देखते हैं, इसलिए लोक सूचना
पदाधिकारी सूचना देने से कतराते हैं या फिर उन्हें दौड़ाते रहते हैं।
नतीजा यह है कि वादों का अंबार आकाश छू रहा है। आवेदक अपनी अपील लेकर
आयोग का चक्कर काटते-काटते थकते जा रहे हैं। युवा सामाजिक कार्यकर्ता
उत्कर्ष सिन्हा को लगता है कि अब हर आवेदक राग दरबारी का बेबस लंगड़
बनकर रह जाएगा, जिसने पूरी जिंदगी एक दस्तावेज की नकल के लिए गंवा दी थी।
आरटीआई असेसमेंट और एडवोकेसी ग्रुप और समय-सेंटर फॉर इक्विटीज के अनुसार,
आज सूचना आयोगों में करीब दो लाख वाद सुनवाई के लिए तरस रहे हैं। अध्ययन
के अनुसार, मध्य प्रदेश में यदि आज कोई अपील दाखिल करता है, तो 60 साल
बाद उसका नंबर आएगा। वहीं पश्चिम बंगाल में उसे 17 साल, राजस्थान में तीन
साल, असम और केरल में दो साल इंतजार करना होगा। खुद केंद्रीय सूचना आयोग
में 26,115 मामले लंबित हैं।
अध्ययन के अनुसार, सबसे अधिक मामले सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में
लंबित हैं। इनकी संख्या 48,442 है, जबकि महाराष्ट्र सूचना मांगने वालों
की हत्या और उत्पीड़न में पूरे देश में अव्वल नंबर पर है। कॉमनवेल्थ
ह्यूमन राइट इनीशिएटिव के अनुसार, महाराष्ट्र में अब तक 53 आवेदकों पर
जानलेवा हमले हो चुके हैं, जिनमें नौ लोगों की जान जा चुकी है, जबकि
बिहार में छह लोग सूचना मांगने के कारण मारे गए हैं। जाने-माने आरटीआई
एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय (जिन्होंने सूचना मांगने के कारण झूठे मामले
में कई महीने जेल में गुजारे थे) के अनुसार, बिहार में आवेदकों पर अब
हमले कुछ कम इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि दहशत के कारण लोग सूचना मांगने के
पहले कई बार सोचते हैं। महाराष्ट्र के बाद गुजरात का नंबर आता है, जहां
34 कार्यकर्ताओं पर हमले हो चुके हैं। उनमें से तीन मारे जा चुके हैं।
मगर उत्तर प्रदेश में सूचना की बदहाली नई मिसाल कायम कर रही है। यहां
फिलहाल नौ सूचना आयुक्त हैं, जिनकी काबिलियत और उदासीनता पर चर्चा चल रही
है। अन्य संस्थानों के साथ-साथ एक्टिविस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी
शर्मा ने यूपी के सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए नौ
आयुक्तों को खुली बहस की चुनौती दी है। सामाजिक कार्यकर्ता, आरटीआई
विशेषज्ञ और 'तहरीर' के संस्थापक अध्यक्ष संजय शर्मा ने भी वर्तमान सूचना
आयुक्तों से एक साथ अकेले या खुली बहस करने की चुनौती दी है। पिछले तीन
वर्षों से केंद्र सरकार सूचना का अधिकार कानून को नई ताकत देने के नाम पर
इसे कमजोर करने का काम कर रही थी। साल 2011 में केंद्रीय सूचना आयोग ने
तत्कालीन राष्ट्रपति (प्रतिभा पाटिल) को अपनी संपत्ति का ब्योरा देने का
आदेश दिया था। उन्हीं दिनों 2-जी स्पेक्ट्रम के संबंध में तत्कालीन वित्त
मंत्री प्रणब मुखर्जी (अब राष्ट्रपति) की फाइल टिप्पणी को सरेआम करना
पड़ा था। फिर रॉबर्ट वाड्रा की लैंड डील का मामला आरटीआई के माध्यम से
उछला।
इन सबका असर सरकार पर दिखाई पड़ा। 15 अक्तूबर, 2011 को केंद्रीय सूचना
आयोग के सालाना सम्मलेन में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था
कि अब हमें सूचना के अधिकार कानून पर आलोचनात्मक रुख अपनाना होगा..,
आरटीआई का सरकारी विचार-विमर्श की प्रक्रिया पर उल्टा असर नहीं पड़ना
चाहिए। फिर अगले साल 12 अक्तूबर, 2012 को मनमोहन सिंह ने कहा कि निजता का
उल्लंघन करने वाली बेहूदा और परेशान करने वाली आरटीआई आवेदनों को लेकर
चिंता पैदा हो रही है। ठीक इसके बाद ही खबर आई थी कि केंद्र सरकार ने यह
फैसला किया है कि वह एक समिति गठित कर यह पता लगाएगी कि सूचना एकत्र करने
और देने पर सरकार का कितना खर्च आता है।
इस तरह की बात सूचना के अधिकार अधिनियम की आत्मा के खिलाफ है, क्योंकि इस
कानून की धारा 7(3) साफ तौर पर कहती कि सूचना की कॉपी पर खर्च आवेदक को
ही वहन करना होगा। साफ है कि दस साल के भीतर ही इसे कमजोर करने की कवायद
शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के कई
फैसलों ने आवेदकों के बीच खलबली मचा दी थी। दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने
एक फैसला सुनाया था कि हर सूचना आयोग दो-आयुक्तों का पीठ होगा, जिसमें एक
हाई कोर्ट के जज होंगे। मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर कोई जज ही होगा। इस
आदेश के बाद कई राज्य आयोग का कामकाज बंद हो गया। बाद में खुद सुप्रीम
कोर्ट ने इस फैसले को 'मिस्टेक ऑफ लॉ' कहकर वापस ले लिया। बिहार सहित कई
राज्यों में धारा 20 के तहत लगाए गए दंड की सही तरीके से वसूली नहीं
होती, जिसके कारण लोक सूचना पदाधिकारियों का मनोबल बढ़ता जा रहा है और
आवेदक भटक रहे हैं। आज दुनिया के लगभग 100 देशों में सूचना का अधिकार
कानून लागू है। दक्षिण एशिया में भारत का कानून सबसे कारगर था, क्योंकि
खुद कार्यकर्ताओं ने इसकी रचना की थी और केंद्र सरकार ने भी इसे लागू
करने में खासी दिलचस्पी दिखाई थी। मगर अब जब सूचना का अधिकार कानून खुद
सरकारों के गले की हड्डी बन चुका है, तब कौन बचाए इसे?
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आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर जनसुनवाई का आयोजन
http://www.instantkhabar.com/lucknow/item/17779-lucknow.html
आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर जनसुनवाई का आयोजन
Written by Editor
Sunday, 12 October 2014 20:21
आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर जनसुनवाई का आयोजन
लखनऊ: आज आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण
मेला मैदान धरना स्थल पर 'येश्वर्याज सेवा संस्थान' द्वारा जनसुनवाई और
जनजागरूकता कैंप का आयोजन किया गया तो वही लोक जीवन में पारदर्शिता
संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के
हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के
निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना और यूपी के हालिया कार्यरत 9
सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट
पर खुली बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा द्वारा दी गयी चुनौती के
कार्यक्रम का आयोजन एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन , आरटीआई
कॉउंसिल ऑफ़ यूपी , ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार कार्यकर्ता
एसोसिएशन, पीपल्स फोरम, मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन सूचना
अधिकार जागरूकता मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी मेमोरियल
समाज सेवा संस्थान , आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स
एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत
निर्माण मंच आदि संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया l कार्यक्रम
की अध्यक्षता तहरीर संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष ईo संजय शर्मा ने
की l संजय शर्मा की गिनती देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है
और उत्तर प्रदेश में आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा
प्रदेश के सभी आरटीआई कार्यकर्ता मानते हैं lकार्यक्रम में प्रतिभागी
संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने
लोगों को आरटीआई के जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही
जनसुनवाई में जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना आयोग की
आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी
समस्याएं
आरटीआई विशेषज्ञों के साथ साझा कर समस्याओ के समाधान के सम्बन्ध
में मार्गदर्शन प्राप्त किया l संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने
अपनी मांगों के सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सम्बोधित एक
मांगपत्र हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया l कार्यक्रम में कामनवेल्थ
ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव नई दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क
उपलब्ध कराई गयी आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया l
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में
पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के
संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था
'तहरीर' को प्राप्त प्रमाणों के आधार पर उन्हें यह कहने में कोई
गुरेज नहीं है कि सूचना आयुक्तों की अक्षमता के कारण ही आरटीआई के तहत
सूचना दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के मार्ग की
सबसे बड़ी वाधा बन गयी है l संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की
पोल-पट्टी खोलकर इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने यूपी
के हालिया कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको
कैमरे के सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और कहा कि इन
आयुक्तों से हार जाने की दशा में उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर
सजाये मौत तक की हर सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया
कि चुनौती के सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को 2 ई-मेल दिनांक
09-10-14 और 10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के राज्य
सूचना आयोग के सचिव के कार्यालय में दिनांक 10-10-14 को एक तीन पेज का
चुनौती पत्र व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर भी प्राप्त करा दिया है l संजय
ने बताया कि उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना
आयुक्तों में से कोई भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में
से 10% भी योग्यता धारित नहीं करते है l संजय बताते हैं कि प्रदेश के
सूचना आयुक्त का पद मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि
क्या यह माना जा सकता है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9
मुख्य सचिव कार्यरत हों वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1
मुख्य सचिव पूरा सूबा संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते
हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त
नितांत अयोग्य हैं और वे मात्र अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह
महत्वपूर्ण पद पा गए हैं l बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और अपने
राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य
नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च पद को कलंकित कर रहे हैं l
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा ने बताया कि उनकी खुली बहस की चुनौती
पर आज यूपी का कोई भी सूचना आयुक्तसामने नहीं आया l संजय ने अब अयोग्य
सूचनाआयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका
दायर करने का निर्णय लिया है l
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग
स्वयं ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है l उर्वशी ने कहा कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में
55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में
सर्वाधिक हैं l नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है और
आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर
रहा है जिसके कारण उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में हीसूचना
का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका है l
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद हुए संगठनों ने एक सुर
से सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि
में चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के
अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों की
विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने , सूचना आयुक्तों के
रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति कराने , 55000 से अधिक लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां
शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल
लागू कराने,आयोग में नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1
सप्ताह के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह
के अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे
जाने की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने , अपीलों
और शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम 30 दिन बाद की देने,सूचना
आयुक्तों और नागरिकों/ आरटीआई कार्यकर्ताओं के पारस्परिक संवाद की
प्रणाली विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को
जनहित के लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने ,
सूचना आयोग में वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा
कर के सुनवाई करने के स्थान पर कुर्सी पर बैठाकर सुनवाई कराने ,
वादियों को झूठे मामलों में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव
करने के लिए वादी द्वारा मांगे जाने पर आयोग की सीसीटीवी फुटेज तत्काल
उपलब्ध कराने, आयुक्तों द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की
सुविधानुसार बदलने की प्रवृत्ति रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की
शॉर्टहैंड बुक पर पेंसिल के स्थान पर पेन से लिखना अनिवार्य करने तथा
शॉर्टहैंड बुक पर उपस्थित वादी और प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने ,
आयुक्तों द्वारा दण्डादेशों को बापस लेने के असंवैधानिक कारनामों पर
तत्काल रोक लगाने, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत तत्काल
समिति बनाकर इस समिति द्वारा अब तक सूचना आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं
द्वारा की गयी उत्पीड़न की शिकायतों की तत्काल जांच कराने, आयोग के
कार्यालयीन कार्यों की लिखित प्रक्रिया बनाये जाने, आयोग के द्वारा
सम्पादित कार्यों की मासिक रिपोर्ट तैयार कराकर स्वतः ही सार्वजनिक
कराने आदि मांगों के साथ धरना देते हुए राज्यपाल को एक ज्ञापन भी प्रेषित
किया l
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी
शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी
मांगें न माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को साथ लेकर सूचना
आयोग और प्रदेश सरकार के खिलाफ वृहद स्तर पर उग्र आंदोलन करने को तैयार
रहने का आव्हान किया l
खबर की श्रेणी लखनऊ
Tagged under
rti
urvashi
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-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
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आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर जनसुनवाई का आयोजन
Written by Editor
Sunday, 12 October 2014 20:21
आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर जनसुनवाई का आयोजन
लखनऊ: आज आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण
मेला मैदान धरना स्थल पर 'येश्वर्याज सेवा संस्थान' द्वारा जनसुनवाई और
जनजागरूकता कैंप का आयोजन किया गया तो वही लोक जीवन में पारदर्शिता
संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के
हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के
निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना और यूपी के हालिया कार्यरत 9
सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट
पर खुली बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा द्वारा दी गयी चुनौती के
कार्यक्रम का आयोजन एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन , आरटीआई
कॉउंसिल ऑफ़ यूपी , ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार कार्यकर्ता
एसोसिएशन, पीपल्स फोरम, मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन सूचना
अधिकार जागरूकता मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी मेमोरियल
समाज सेवा संस्थान , आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स
एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत
निर्माण मंच आदि संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया l कार्यक्रम
की अध्यक्षता तहरीर संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष ईo संजय शर्मा ने
की l संजय शर्मा की गिनती देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है
और उत्तर प्रदेश में आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा
प्रदेश के सभी आरटीआई कार्यकर्ता मानते हैं lकार्यक्रम में प्रतिभागी
संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने
लोगों को आरटीआई के जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही
जनसुनवाई में जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना आयोग की
आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी
समस्याएं
आरटीआई विशेषज्ञों के साथ साझा कर समस्याओ के समाधान के सम्बन्ध
में मार्गदर्शन प्राप्त किया l संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने
अपनी मांगों के सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सम्बोधित एक
मांगपत्र हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया l कार्यक्रम में कामनवेल्थ
ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव नई दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क
उपलब्ध कराई गयी आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया l
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में
पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के
संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था
'तहरीर' को प्राप्त प्रमाणों के आधार पर उन्हें यह कहने में कोई
गुरेज नहीं है कि सूचना आयुक्तों की अक्षमता के कारण ही आरटीआई के तहत
सूचना दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के मार्ग की
सबसे बड़ी वाधा बन गयी है l संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की
पोल-पट्टी खोलकर इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने यूपी
के हालिया कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको
कैमरे के सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और कहा कि इन
आयुक्तों से हार जाने की दशा में उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर
सजाये मौत तक की हर सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया
कि चुनौती के सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को 2 ई-मेल दिनांक
09-10-14 और 10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के राज्य
सूचना आयोग के सचिव के कार्यालय में दिनांक 10-10-14 को एक तीन पेज का
चुनौती पत्र व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर भी प्राप्त करा दिया है l संजय
ने बताया कि उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना
आयुक्तों में से कोई भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में
से 10% भी योग्यता धारित नहीं करते है l संजय बताते हैं कि प्रदेश के
सूचना आयुक्त का पद मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि
क्या यह माना जा सकता है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9
मुख्य सचिव कार्यरत हों वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1
मुख्य सचिव पूरा सूबा संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते
हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त
नितांत अयोग्य हैं और वे मात्र अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह
महत्वपूर्ण पद पा गए हैं l बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और अपने
राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य
नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च पद को कलंकित कर रहे हैं l
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा ने बताया कि उनकी खुली बहस की चुनौती
पर आज यूपी का कोई भी सूचना आयुक्तसामने नहीं आया l संजय ने अब अयोग्य
सूचनाआयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका
दायर करने का निर्णय लिया है l
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग
स्वयं ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है l उर्वशी ने कहा कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में
55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में
सर्वाधिक हैं l नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है और
आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर
रहा है जिसके कारण उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में हीसूचना
का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका है l
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद हुए संगठनों ने एक सुर
से सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि
में चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के
अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों की
विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने , सूचना आयुक्तों के
रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति कराने , 55000 से अधिक लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां
शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल
लागू कराने,आयोग में नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1
सप्ताह के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह
के अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे
जाने की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने , अपीलों
और शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम 30 दिन बाद की देने,सूचना
आयुक्तों और नागरिकों/ आरटीआई कार्यकर्ताओं के पारस्परिक संवाद की
प्रणाली विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को
जनहित के लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने ,
सूचना आयोग में वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा
कर के सुनवाई करने के स्थान पर कुर्सी पर बैठाकर सुनवाई कराने ,
वादियों को झूठे मामलों में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव
करने के लिए वादी द्वारा मांगे जाने पर आयोग की सीसीटीवी फुटेज तत्काल
उपलब्ध कराने, आयुक्तों द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की
सुविधानुसार बदलने की प्रवृत्ति रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की
शॉर्टहैंड बुक पर पेंसिल के स्थान पर पेन से लिखना अनिवार्य करने तथा
शॉर्टहैंड बुक पर उपस्थित वादी और प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने ,
आयुक्तों द्वारा दण्डादेशों को बापस लेने के असंवैधानिक कारनामों पर
तत्काल रोक लगाने, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत तत्काल
समिति बनाकर इस समिति द्वारा अब तक सूचना आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं
द्वारा की गयी उत्पीड़न की शिकायतों की तत्काल जांच कराने, आयोग के
कार्यालयीन कार्यों की लिखित प्रक्रिया बनाये जाने, आयोग के द्वारा
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कराने आदि मांगों के साथ धरना देते हुए राज्यपाल को एक ज्ञापन भी प्रेषित
किया l
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी
शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी
मांगें न माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को साथ लेकर सूचना
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101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
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आरटीआई का पालन नहीं होने पर धरना
आरटीआई का पालन नहीं होने पर धरना
Oct 13, 2014, 06.30AM IST
एनबीटी, लखनऊ : सूचना का अधिकार अधिनियम के नौ वर्ष पूरे होने पर राजधानी
के कई संगठनों ने लक्ष्मण मेला मैदान में धरना दिया। धरने पर बैठे संगठन
के सदस्यों का कहना था कि राज्य सूचना आयोग समेत कई विभाग नियमों को ताख
पर रख आरटीआई कानून की अवहेलना करते हैं। कार्यक्रम के मीडिया प्रभारी
ज्ञानेश पांडेय ने कहा कि इस कार्यक्रम में सूचना आयुक्तों से डीबेट करने
की खुली छूट दी गई थी, लेकिन कार्यक्रम में कोई नहीं आया। उन्होंने कहा
कि सूचना आयोग में आज की तारीख में 55 हजार से ज्यादा मामले लम्बित हैं।
उसके बाद भी इन मामलों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। इस दौरान
येश्वर्याज सेवा संस्थान की ओर से यहां जनसुनवाई और जनजागरूकता कैंप भी
लगाया गया। इस धरने में काउंसलिंग ऑफ यूपी, ट्रैप संस्था अलीगढ, पीपल्स
फोरम, जन सूचना अधिकार जागरूकता मंच, समाज सेवा संस्थान और भागीदारी मंच
के सदस्यों ने हिस्सा लिया। Navbharat Times
--
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एनबीटी, लखनऊ : सूचना का अधिकार अधिनियम के नौ वर्ष पूरे होने पर राजधानी
के कई संगठनों ने लक्ष्मण मेला मैदान में धरना दिया। धरने पर बैठे संगठन
के सदस्यों का कहना था कि राज्य सूचना आयोग समेत कई विभाग नियमों को ताख
पर रख आरटीआई कानून की अवहेलना करते हैं। कार्यक्रम के मीडिया प्रभारी
ज्ञानेश पांडेय ने कहा कि इस कार्यक्रम में सूचना आयुक्तों से डीबेट करने
की खुली छूट दी गई थी, लेकिन कार्यक्रम में कोई नहीं आया। उन्होंने कहा
कि सूचना आयोग में आज की तारीख में 55 हजार से ज्यादा मामले लम्बित हैं।
उसके बाद भी इन मामलों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। इस दौरान
येश्वर्याज सेवा संस्थान की ओर से यहां जनसुनवाई और जनजागरूकता कैंप भी
लगाया गया। इस धरने में काउंसलिंग ऑफ यूपी, ट्रैप संस्था अलीगढ, पीपल्स
फोरम, जन सूचना अधिकार जागरूकता मंच, समाज सेवा संस्थान और भागीदारी मंच
के सदस्यों ने हिस्सा लिया। Navbharat Times
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आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर धरना
http://satyamevindia.com/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%86%E0%A4%88-%E0%A4%8F%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%9F-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%97/
आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर धरना
Author: Satyamev India October 12, 2014
Uncategorized, उत्तर प्रदेश, एक्टिविस्ट न्यूज, देश, राज्य, समाचार
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आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान
धरना स्थल पर पूर्वान्ह 11 बजे से अपरान्ह 03 बजे तक संस्था 'येश्वर्याज
सेवा संस्थान' द्वारा जनसुनवाई और जनजागरूकता कैंप का आयोजन किया गया तो
वही लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के
निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना
आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली
बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा द्वारा दी गयी चुनौती के कार्यक्रम
का आयोजन एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन , आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी ,
ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम,
मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन सूचना अधिकार जागरूकता
मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी मेमोरियल समाज सेवा संस्थान
, आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर
एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत निर्माण मंच आदि
संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया l कार्यक्रम की अध्यक्षता तहरीर
संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष ईo संजय शर्मा ने की l संजय शर्मा की
गिनती देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है और उत्तर प्रदेश
में आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा प्रदेश के सभी आरटीआई
कार्यकर्ता मानते हैं lकार्यक्रम में प्रतिभागी संगठनों के प्रतिनिधियों
के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने
प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने लोगों को आरटीआई के
जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही जनसुनवाई में
जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना आयोग की आरटीआई एक्ट के
क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी समस्याएं आरटीआई
विशेषज्ञों के साथ साझा कर समस्याओ के समाधान के सम्बन्ध में मार्गदर्शन
प्राप्त किया l संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने अपनी मांगों के
सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सम्बोधित एक मांगपत्र
हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया l कार्यक्रम में कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स
इनिशिएटिव नई दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क उपलब्ध कराई गयी
आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया l
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में
पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के
संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था
'तहरीर' को प्राप्त प्रमाणों के आधार पर उन्हें यह कहने में कोई गुरेज
नहीं है कि सूचना आयुक्तों की अक्षमता के कारण ही आरटीआई के तहत सूचना
दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के मार्ग की सबसे बड़ी
वाधा बन गयी है l संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की पोल-पट्टी खोलकर
इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने यूपी के हालिया
कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के
सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और कहा कि इन आयुक्तों से हार
जाने की दशा में उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर सजाये मौत तक की हर
सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया कि चुनौती के
सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को 2 ई-मेल दिनांक 09-10-14 और
10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग
के सचिव के कार्यालय में दिनांक 10-10-14 को एक तीन पेज का चुनौती पत्र
व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर भी प्राप्त करा दिया है l संजय ने बताया कि
उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्तों में से कोई
भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में से 10% भी योग्यता
धारित नहीं करते है l संजय बताते हैं कि प्रदेश के सूचना आयुक्त का पद
मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि क्या यह माना जा सकता
है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9 मुख्य सचिव कार्यरत हों
वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1 मुख्य सचिव पूरा सूबा
संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते हैं कि ऐसा इसलिए है
क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त नितांत अयोग्य हैं और वे
मात्र अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह महत्वपूर्ण पद पा गए हैं l
बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और अपने राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते
ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च
पद को कलंकित कर रहे हैं l
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा ने बताया कि उनकी खुली बहस की चुनौती पर आज
यूपी का कोई भी सूचना आयुक्तसामने नहीं आया l संजय ने अब अयोग्य सूचना
आयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका दायर
करने का निर्णय लिया है l
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग स्वयं
ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है l उर्वशी ने कहा कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में
55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में
सर्वाधिक हैं l नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है और
आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर
रहा है जिसके कारण उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में ही सूचना
का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका है l
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद हुए संगठनों ने एक सुर से
सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि में
चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के
अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों की
विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने , सूचना आयुक्तों के
रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति कराने , 55000 से अधिक लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां
शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल
लागू कराने,आयोग में नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1 सप्ताह
के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह के
अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे जाने
की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने , अपीलों और
शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम 30 दिन बाद की देने,सूचना
आयुक्तों और नागरिकों/ आरटीआई कार्यकर्ताओं के पारस्परिक संवाद की
प्रणाली विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को
जनहित के लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने ,
सूचना आयोग में वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा
कर के सुनवाई करने के स्थान पर कुर्सी पर बैठाकर सुनवाई कराने , वादियों
को झूठे मामलों में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव करने के
लिए वादी द्वारा मांगे जाने पर आयोग की सीसीटीवी फुटेज तत्काल उपलब्ध
कराने, आयुक्तों द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की सुविधानुसार
बदलने की प्रवृत्ति रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की शॉर्टहैंड बुक पर
पेंसिल के स्थान पर पेन से लिखना अनिवार्य करने तथा शॉर्टहैंड बुक पर
उपस्थित वादी और प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने , आयुक्तों द्वारा
दण्डादेशों को बापस लेने के असंवैधानिक कारनामों पर तत्काल रोक लगाने,
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत तत्काल समिति बनाकर इस
समिति द्वारा अब तक सूचना आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं द्वारा की गयी
उत्पीड़न की शिकायतों की तत्काल जांच कराने, आयोग के कार्यालयीन कार्यों
की लिखित प्रक्रिया बनाये जाने, आयोग के द्वारा सम्पादित कार्यों की
मासिक रिपोर्ट तैयार कराकर स्वतः ही सार्वजनिक कराने आदि मांगों के साथ
धरना देते हुए राज्यपाल को एक ज्ञापन भी प्रेषित किया l
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी
शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी
मांगें न माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को साथ लेकर सूचना
आयोग और प्रदेश सरकार के खिलाफ वृहद स्तर पर उग्र आंदोलन करने को तैयार
रहने का आव्हान किया l
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आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर धरना
Author: Satyamev India October 12, 2014
Uncategorized, उत्तर प्रदेश, एक्टिविस्ट न्यूज, देश, राज्य, समाचार
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आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान
धरना स्थल पर पूर्वान्ह 11 बजे से अपरान्ह 03 बजे तक संस्था 'येश्वर्याज
सेवा संस्थान' द्वारा जनसुनवाई और जनजागरूकता कैंप का आयोजन किया गया तो
वही लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर
कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के
निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना
आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली
बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा द्वारा दी गयी चुनौती के कार्यक्रम
का आयोजन एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन , आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी ,
ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम,
मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन सूचना अधिकार जागरूकता
मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी मेमोरियल समाज सेवा संस्थान
, आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर
एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत निर्माण मंच आदि
संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया l कार्यक्रम की अध्यक्षता तहरीर
संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष ईo संजय शर्मा ने की l संजय शर्मा की
गिनती देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है और उत्तर प्रदेश
में आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा प्रदेश के सभी आरटीआई
कार्यकर्ता मानते हैं lकार्यक्रम में प्रतिभागी संगठनों के प्रतिनिधियों
के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने
प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने लोगों को आरटीआई के
जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही जनसुनवाई में
जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना आयोग की आरटीआई एक्ट के
क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी समस्याएं आरटीआई
विशेषज्ञों के साथ साझा कर समस्याओ के समाधान के सम्बन्ध में मार्गदर्शन
प्राप्त किया l संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने अपनी मांगों के
सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सम्बोधित एक मांगपत्र
हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया l कार्यक्रम में कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स
इनिशिएटिव नई दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क उपलब्ध कराई गयी
आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया l
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में
पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के
संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था
'तहरीर' को प्राप्त प्रमाणों के आधार पर उन्हें यह कहने में कोई गुरेज
नहीं है कि सूचना आयुक्तों की अक्षमता के कारण ही आरटीआई के तहत सूचना
दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के मार्ग की सबसे बड़ी
वाधा बन गयी है l संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की पोल-पट्टी खोलकर
इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने यूपी के हालिया
कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के
सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और कहा कि इन आयुक्तों से हार
जाने की दशा में उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर सजाये मौत तक की हर
सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया कि चुनौती के
सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को 2 ई-मेल दिनांक 09-10-14 और
10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग
के सचिव के कार्यालय में दिनांक 10-10-14 को एक तीन पेज का चुनौती पत्र
व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर भी प्राप्त करा दिया है l संजय ने बताया कि
उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्तों में से कोई
भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में से 10% भी योग्यता
धारित नहीं करते है l संजय बताते हैं कि प्रदेश के सूचना आयुक्त का पद
मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि क्या यह माना जा सकता
है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9 मुख्य सचिव कार्यरत हों
वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1 मुख्य सचिव पूरा सूबा
संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते हैं कि ऐसा इसलिए है
क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त नितांत अयोग्य हैं और वे
मात्र अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह महत्वपूर्ण पद पा गए हैं l
बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और अपने राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते
ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च
पद को कलंकित कर रहे हैं l
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा ने बताया कि उनकी खुली बहस की चुनौती पर आज
यूपी का कोई भी सूचना आयुक्तसामने नहीं आया l संजय ने अब अयोग्य सूचना
आयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका दायर
करने का निर्णय लिया है l
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग स्वयं
ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है l उर्वशी ने कहा कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में
55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में
सर्वाधिक हैं l नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है और
आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर
रहा है जिसके कारण उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में ही सूचना
का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका है l
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद हुए संगठनों ने एक सुर से
सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि में
चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के
अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों की
विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने , सूचना आयुक्तों के
रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति कराने , 55000 से अधिक लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां
शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल
लागू कराने,आयोग में नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1 सप्ताह
के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह के
अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे जाने
की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने , अपीलों और
शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम 30 दिन बाद की देने,सूचना
आयुक्तों और नागरिकों/ आरटीआई कार्यकर्ताओं के पारस्परिक संवाद की
प्रणाली विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को
जनहित के लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने ,
सूचना आयोग में वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा
कर के सुनवाई करने के स्थान पर कुर्सी पर बैठाकर सुनवाई कराने , वादियों
को झूठे मामलों में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव करने के
लिए वादी द्वारा मांगे जाने पर आयोग की सीसीटीवी फुटेज तत्काल उपलब्ध
कराने, आयुक्तों द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की सुविधानुसार
बदलने की प्रवृत्ति रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की शॉर्टहैंड बुक पर
पेंसिल के स्थान पर पेन से लिखना अनिवार्य करने तथा शॉर्टहैंड बुक पर
उपस्थित वादी और प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने , आयुक्तों द्वारा
दण्डादेशों को बापस लेने के असंवैधानिक कारनामों पर तत्काल रोक लगाने,
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत तत्काल समिति बनाकर इस
समिति द्वारा अब तक सूचना आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं द्वारा की गयी
उत्पीड़न की शिकायतों की तत्काल जांच कराने, आयोग के कार्यालयीन कार्यों
की लिखित प्रक्रिया बनाये जाने, आयोग के द्वारा सम्पादित कार्यों की
मासिक रिपोर्ट तैयार कराकर स्वतः ही सार्वजनिक कराने आदि मांगों के साथ
धरना देते हुए राज्यपाल को एक ज्ञापन भी प्रेषित किया l
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी
शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी
मांगें न माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को साथ लेकर सूचना
आयोग और प्रदेश सरकार के खिलाफ वृहद स्तर पर उग्र आंदोलन करने को तैयार
रहने का आव्हान किया l
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
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http://www.newstodaytime.com/2014/10/blog-post_84.html
आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर धरना
Written By Bureau News on Monday, October 13, 2014 | 2:33 PM
10703923_1542084846008001_8997629752491265547_n
लखनऊ।। आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला
मैदान धरना स्थल पर पूर्वान्ह 11 बजे से अपरान्ह 03 बजे तक संस्था
'येश्वर्याज सेवा संस्थान' द्वारा जनसुनवाई और जनजागरूकता कैंप का आयोजन
किया गया तो वही लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और
आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर
पर कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के
निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना
आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली
बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा द्वारा दी गयी चुनौती के कार्यक्रम
का आयोजन एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन, आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी,
ट्रैप संस्था अलीगढ, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम,
मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद, जन सूचना अधिकार जागरूकता मंच,
भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच, एसआरपीडी मेमोरियल समाज सेवा संस्थान, आल
इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर
एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत निर्माण मंच आदि
संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता तहरीर
संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष ईo संजय शर्मा ने की। संजय शर्मा की गिनती
देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है और उत्तर प्रदेश में
आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा प्रदेश के सभी आरटीआई
कार्यकर्ता मानते हैं। कार्यक्रम में प्रतिभागी संगठनों के प्रतिनिधियों
के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने
प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने लोगों को आरटीआई के
जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही जनसुनवाई में
जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना आयोग की आरटीआई एक्ट के
क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी समस्याएं आरटीआई
विशेषज्ञों के साथ साझा कर समस्याओ के समाधान के सम्बन्ध में मार्गदर्शन
प्राप्त किया। संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने अपनी मांगों के
सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सम्बोधित एक मांगपत्र
हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया l कार्यक्रम में कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स
इनिशिएटिव नई दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क उपलब्ध कराई गयी
आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया।
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में
पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के
संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था
'तहरीर' को प्राप्त प्रमाणों के आधार पर उन्हें यह कहने में कोई गुरेज
नहीं है कि सूचना आयुक्तों की अक्षमता के कारण ही आरटीआई के तहत सूचना
दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के मार्ग की सबसे बड़ी
वाधा बन गयी है। संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की पोल-पट्टी खोलकर
इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने यूपी के हालिया
कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के
सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और कहा कि इन आयुक्तों से हार
जाने की दशा में उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर सजाये मौत तक की हर
सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया कि चुनौती के
सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को 2 ई-मेल दिनांक 09-10-14 और
10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग
के सचिव के कार्यालय में दिनांक 10-10-14 को एक तीन पेज का चुनौती पत्र
व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर भी प्राप्त करा दिया है। संजय ने बताया कि
उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्तों में से कोई
भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में से 10% भी योग्यता
धारित नहीं करते है। संजय बताते हैं कि प्रदेश के सूचना आयुक्त का पद
मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि क्या यह माना जा सकता
है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9 मुख्य सचिव कार्यरत हों
वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1 मुख्य सचिव पूरा सूबा
संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते हैं कि ऐसा इसलिए है
क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त नितांत अयोग्य हैं और वे
मात्र अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह महत्वपूर्ण पद पा गए हैं।
बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और अपने राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते
ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च
पद को कलंकित कर रहे हैं।
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा ने बताया कि उनकी खुली बहस की चुनौती पर
आज यूपी का कोई भी सूचना आयुक्तसामने नहीं आया। संजय ने अब अयोग्य सूचना
आयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका दायर
करने का निर्णय लिया है।
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग
स्वयं ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है। उर्वशी ने कहा कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में
55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में
सर्वाधिक हैं। नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है और
आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर
रहा है जिसके कारण उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में ही सूचना
का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका है।
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद हुए संगठनों ने एक सुर से
सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि में
चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के
अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों की
विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने, सूचना आयुक्तों के
रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति कराने, 55000 से अधिक लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां
शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल
लागू कराने,आयोग में नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1 सप्ताह
के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह के
अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे जाने
की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने, अपीलों और
शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम 30 दिन बाद की देने,सूचना
आयुक्तों और नागरिकों/आरटीआई कार्यकर्ताओं के पारस्परिक संवाद की प्रणाली
विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को जनहित के
लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने, सूचना आयोग में
वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा कर के सुनवाई
करने के स्थान पर कुर्सी पर बैठाकर सुनवाई कराने, वादियों को झूठे मामलों
में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव करने के लिए वादी द्वारा
मांगे जाने पर आयोग की सीसीटीवी फुटेज तत्काल उपलब्ध कराने, आयुक्तों
द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की सुविधानुसार बदलने की प्रवृत्ति
रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की शॉर्टहैंड बुक पर पेंसिल के स्थान पर
पेन से लिखना अनिवार्य करने तथा शॉर्टहैंड बुक पर उपस्थित वादी और
प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने , आयुक्तों द्वारा दण्डादेशों को बापस लेने
के असंवैधानिक कारनामों पर तत्काल रोक लगाने, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न
रोकथाम कानून के तहत तत्काल समिति बनाकर इस समिति द्वारा अब तक सूचना
आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं द्वारा की गयी उत्पीड़न की शिकायतों की
तत्काल जांच कराने, आयोग के कार्यालयीन कार्यों की लिखित प्रक्रिया बनाये
जाने, आयोग के द्वारा सम्पादित कार्यों की मासिक रिपोर्ट तैयार कराकर
स्वतः ही सार्वजनिक कराने आदि मांगों के साथ धरना देते हुए राज्यपाल को
एक ज्ञापन भी प्रेषित किया।
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी
शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी
मांगें न माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को साथ लेकर सूचना
आयोग और प्रदेश सरकार के खिलाफ वृहद स्तर पर उग्र आंदोलन करने को तैयार
रहने का आव्हान किया।
--
-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
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101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
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Note : if you don't want to receive mails from me,kindly inform me so
that i should delete your name from my mailing list.
आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर धरना
Written By Bureau News on Monday, October 13, 2014 | 2:33 PM
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लखनऊ।। आरटीआई एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला
मैदान धरना स्थल पर पूर्वान्ह 11 बजे से अपरान्ह 03 बजे तक संस्था
'येश्वर्याज सेवा संस्थान' द्वारा जनसुनवाई और जनजागरूकता कैंप का आयोजन
किया गया तो वही लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और
आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर
पर कार्यशील संस्था 'तहरीर' द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के
निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में धरना और यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना
आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली
बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा द्वारा दी गयी चुनौती के कार्यक्रम
का आयोजन एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन, आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी,
ट्रैप संस्था अलीगढ, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम,
मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद, जन सूचना अधिकार जागरूकता मंच,
भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच, एसआरपीडी मेमोरियल समाज सेवा संस्थान, आल
इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर
एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत निर्माण मंच आदि
संगठनों के साथ संयुक्त रूप से किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता तहरीर
संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष ईo संजय शर्मा ने की। संजय शर्मा की गिनती
देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है और उत्तर प्रदेश में
आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा प्रदेश के सभी आरटीआई
कार्यकर्ता मानते हैं। कार्यक्रम में प्रतिभागी संगठनों के प्रतिनिधियों
के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने
प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने लोगों को आरटीआई के
जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही जनसुनवाई में
जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना आयोग की आरटीआई एक्ट के
क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी समस्याएं आरटीआई
विशेषज्ञों के साथ साझा कर समस्याओ के समाधान के सम्बन्ध में मार्गदर्शन
प्राप्त किया। संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने अपनी मांगों के
सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सम्बोधित एक मांगपत्र
हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया l कार्यक्रम में कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स
इनिशिएटिव नई दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क उपलब्ध कराई गयी
आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया।
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में
पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के
संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था
'तहरीर' को प्राप्त प्रमाणों के आधार पर उन्हें यह कहने में कोई गुरेज
नहीं है कि सूचना आयुक्तों की अक्षमता के कारण ही आरटीआई के तहत सूचना
दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के मार्ग की सबसे बड़ी
वाधा बन गयी है। संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की पोल-पट्टी खोलकर
इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने यूपी के हालिया
कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के
सामने एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और कहा कि इन आयुक्तों से हार
जाने की दशा में उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर सजाये मौत तक की हर
सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया कि चुनौती के
सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को 2 ई-मेल दिनांक 09-10-14 और
10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग
के सचिव के कार्यालय में दिनांक 10-10-14 को एक तीन पेज का चुनौती पत्र
व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर भी प्राप्त करा दिया है। संजय ने बताया कि
उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्तों में से कोई
भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में से 10% भी योग्यता
धारित नहीं करते है। संजय बताते हैं कि प्रदेश के सूचना आयुक्त का पद
मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि क्या यह माना जा सकता
है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9 मुख्य सचिव कार्यरत हों
वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1 मुख्य सचिव पूरा सूबा
संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते हैं कि ऐसा इसलिए है
क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त नितांत अयोग्य हैं और वे
मात्र अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह महत्वपूर्ण पद पा गए हैं।
बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और अपने राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते
ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च
पद को कलंकित कर रहे हैं।
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा ने बताया कि उनकी खुली बहस की चुनौती पर
आज यूपी का कोई भी सूचना आयुक्तसामने नहीं आया। संजय ने अब अयोग्य सूचना
आयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका दायर
करने का निर्णय लिया है।
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग
स्वयं ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है। उर्वशी ने कहा कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में
55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में
सर्वाधिक हैं। नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है और
आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर
रहा है जिसके कारण उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में ही सूचना
का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका है।
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद हुए संगठनों ने एक सुर से
सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि में
चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के
अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों की
विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने, सूचना आयुक्तों के
रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से सूचना आयुक्तों
की नियुक्ति कराने, 55000 से अधिक लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां
शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल
लागू कराने,आयोग में नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1 सप्ताह
के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह के
अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे जाने
की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने, अपीलों और
शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम 30 दिन बाद की देने,सूचना
आयुक्तों और नागरिकों/आरटीआई कार्यकर्ताओं के पारस्परिक संवाद की प्रणाली
विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को जनहित के
लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने, सूचना आयोग में
वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा कर के सुनवाई
करने के स्थान पर कुर्सी पर बैठाकर सुनवाई कराने, वादियों को झूठे मामलों
में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव करने के लिए वादी द्वारा
मांगे जाने पर आयोग की सीसीटीवी फुटेज तत्काल उपलब्ध कराने, आयुक्तों
द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की सुविधानुसार बदलने की प्रवृत्ति
रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की शॉर्टहैंड बुक पर पेंसिल के स्थान पर
पेन से लिखना अनिवार्य करने तथा शॉर्टहैंड बुक पर उपस्थित वादी और
प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने , आयुक्तों द्वारा दण्डादेशों को बापस लेने
के असंवैधानिक कारनामों पर तत्काल रोक लगाने, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न
रोकथाम कानून के तहत तत्काल समिति बनाकर इस समिति द्वारा अब तक सूचना
आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं द्वारा की गयी उत्पीड़न की शिकायतों की
तत्काल जांच कराने, आयोग के कार्यालयीन कार्यों की लिखित प्रक्रिया बनाये
जाने, आयोग के द्वारा सम्पादित कार्यों की मासिक रिपोर्ट तैयार कराकर
स्वतः ही सार्वजनिक कराने आदि मांगों के साथ धरना देते हुए राज्यपाल को
एक ज्ञापन भी प्रेषित किया।
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी
शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी
मांगें न माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को साथ लेकर सूचना
आयोग और प्रदेश सरकार के खिलाफ वृहद स्तर पर उग्र आंदोलन करने को तैयार
रहने का आव्हान किया।
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-Sincerely Yours,
Urvashi Sharma
Secretary - YAISHWARYAJ SEVA SANSTHAAN
101,Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram,Lucknow-226017,Uttar Pradesh,India
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption 9455553838
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that i should delete your name from my mailing list.
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